Friday, 9 January 2015

एलियंस की खूशफ़हमी से ज़्यादा...

भारतीय गणतंत्र दिवस 2013 के शुभ-अवसर पे दिए गये अपने संतोषप्रद भाषण के बाद.. ज्यों पलटा तो मेरी नज़रें ठंड में ठिठुरते बगल के गाँव के उन नन्हें बच्चों पे जा टिकी.. जो उस दिन हमारे इंजिनियरिंग कॉलेज में आए थे। वे बड़े ही कौतुहुल भाव से टक-टकी लगाए बस उस नज़ारे को देखे ही जा रहे थे। उनके लिए सब-कुछ विचित्र ही था। दिवस के महत्व से ज़्यादा शायद खुद के प्रत्यक्ष प्रमाणों में कुछ खोए हुए से..। कॉलेज में उस दिन के समारोह में हम सब उनके लिए विचित्र थे तो उनकी भावुकता मेरे लिए.. मानो मुझे एक अजीबोगरीब ग्रह की ओर खींचे चली जा रही है। फिर समारोह समापन के उपरांत सभो को गरमागरम जलेबीयाँ दी गई.. और वे बड़े ही वृहत-भाव में फूले नहीं समा रहे थे। उन सभो के संस्थान परिसर से जाने के बाद... जैसी मेरी व्याकुलता भी उन सभी बच्चों के संग हो चली थी। वो हमारे ही जैसे  भारत माता के ही बच्चे थे.. हमारी आने वाली कल की धरोहर..। मन ही मन मैं अपने संस्थान के चेयरमॅन को धन्यवाद दे रहा था.. की अच्छा हुआ जो उन्होने मुझे एक दिन पूर्व पटना जाने से रोक दिया.. नहीं तो मैं उस क्षण को दोबारा नहीं जी पाता। फिर दिन के भोजन के बाद मैं अपने कमरे में आया और थोड़े विश्राम के मन से पलंग पे लेट सा गया..। कुछ ही पलों में लगा जैसे वे बच्चे मुझे निमंत्रण दे गये हों। उनकी स्थिति देख मैं गहन चिंतन में डूब सा गया था। उस दिन की ठंडी में भी कम कपड़ों से ठिठुरते उनके उत्साहित भाव ने ही मुझे झकझोड़ सा दिया था। फिर तो जैसे एक नये सफ़र को निकलना ही था। झट मैने अपने बॅग से अपना कॅमरा निकाला.. अपने एक लेक्चरर कलिग को साथ लिया और पास के ही गाँव को निकल पड़ा। शुक्र था की वो लेक्चरर भी मेरा छात्र रहा था.. इसलिए बेमौके मेरे निर्देशों पे भी उसे ज़रा भी अचरज नहीं हुआ.. और हम उस दोपहर को कुछ लुभावने फोटोग्राफी करते हुए आगे चले जा रहे थे। रास्ते में मिले कुछ नील-गायों के दृश्यों को कॅमरे में समेटे आगे बढ़े ही थे की.. कुछ बच्चे गाँव के बगल वाली एक सपाट मैदान पे क्रिकेट खेलते नज़र आ गये।
हम जैसे जैसे उनकी ओर बढ़ते जा रहे थे.. उन सभो का ध्यान भी हमारी ओर ही आकृष्ट हुआ जा रहा था। फिर मैदान की बाउंड्री पे ही हम जा बैठे की कहीं हमें देख उनके खेल में कुछ खलल ना पड़ जाए। फिर मैं बाउंड्री से ही "कंट्री-साइड क्रिकेट थीम " की कुछ रोचक तस्वीरें अपने कॅमरे से निकालता रहा। धीरे-धीरे कुछ बच्चे भी हमारी ओर आने लगे.. ये छोटे नन्हे बच्चे वही थे.. जो आज हमारे कॉलेज को आए थे। वो हमें देख मुस्कुरा रहे थे.. एक बच्चे ने भोजपुरी में कहा.. " ई ता कॅलिज के पोफेसर लागा तानी"। और फिर पास आकर मुझे और मेरी फोटोग्राफी को देखने लगे। मैं भी उन्हें अपनी ली गयी कुछ फोटोस को उस डिजिटल कॅमरे से दिखाने लगा। फिर तो धीरे-धीरे अच्छी ख़ासी भीड़ सी जमा हो गयी हमारे आस-पास। ढलती शाम और मॅच की समाप्ति के बाद सारे मैदान के लड़के हमारे आस-पास ही थे। बहूत दिनो बाद उस विश्मय भावुकता का एक विह्वल कर देने सा दृश्य उभरकर मेरे सामने था। उनके और हम-सभो के भिन्न कद-काठीयों में बस एक समानता थी.. वो था एक प्यारा सा मन.. जो उस जीवन को भी साकार था। उन सभो के हंसते हुए चेहरों से निकलते भावों की रूप-रेखा अन्यतम सी थी। फिर मैने सभो से पूछा- " आप लोगो को पता है.. की आप जिस प्रदेश में रहते हो वो क्यों प्रसिद्ध है ?" उनके भाव शून्य से थे। फिर एक लड़के ने कहा -" हाँ, बक्सर का युद्ध हुआ था यहाँ..।" फिर मैने कहा-" भगवान राम-लक्ष्मण को जानते हो..? रामायण की कहानियाँ पढ़ी है। ये वही जगह जगह है जहाँ राम-लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में पढ़ाई करते थे.. और ये सदियों से बड़ा ही अलौकिक प्रदेश रहा है। "... इतना कहते  ही मैने सभो में एक दिव्य-अंकुरण को देखा। फिर उनके पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी बातों का कुछ ज़िक्र किया। इतने में एक लड़के ने पूछा.. "ई कॉलेज में ITI के पढ़ाई होता है क्या? हमरा दुगो चाचा यही पढ़ाई कर के दुबई में नौकरी कर र्रहे हैं।" ...और बात भी सही है.. इस भू-भाग के सैंकड़ों लोग अर्थाभाव में  ITI जैसी प्राथमिक  तकनीकी शिक्षा को हासिल कर बहूत कम उम्र में मोटी रकम कमाई के लिए खाड़ी देशों का रुख़ कर लेते हैं..और स्नातक स्तर की वैचारिकता और शिक्षण का बोध नहीं कर पाते। फिर मैने उन्हें इंजिनियरिंग के विषय और महत्व के बारे में बताया। इतने में देखा गाँव के कुछ युवक हाथों में मोबाइल लिए.. भोजपुरी गानो की धुन के साथ हमारी ओर घूरते चले आ रहे हैं। इतने में वहाँ जमा बच्चे उनके मोबाइल की धुन की ओर चल परे... और फिर मैं भी वहाँ से अपने कॉलेज की ओर निकल पड़ा।

शायद वो पहला मौका थे जब हम कॉलेज से अगल-बगल की हरी वादियों में पहली बार निकले थे। उस बार याद है.. मकर-संक्रांति के बाद मैं दो-तीन हफ्ते बाद ही पटना को आया था। ..लेकिन गाँव के बच्चों के साथ बिताए कुछ पलों ने मुझे बाहर की प्रकृति के साथ खोल कर रख दिया था। मानसिक क्लेश को कुछ कम होता भी देख पा रहा था.. और हो भी क्यों ना.. जब जीवन में आपकी अभिव्यक्ति को कम ही मौके मिलते हों.. उसके अंतरिम दर्पण में समाने को। फिर हम उस दिन की तरह हर रोज़ कॉलेज के चारो ओर किसी न किसी दिशा में निकल पड़ते.. और खोज लाते जीवन की उस समृद्ध संजीवनी को जो आज भी हमारे जैविक-विन्यास को सहेजे हुएँ हैं। उसी दौरान एक दिन शाम के वक़्त कानो में भक्ति-रस में गूंजते कुछ बोल सुनने को मिले। कॉलेज के चारो ओर छायी हरियाली से वो आवाज़ कुछ रिस-रिस का कानो में समा जाती.. और मैं खुद में मग्न हो जाता। फिर पता चला दूर गाँव में एक नये मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा स्थापन कार्य चल रहा है। ये सुनने के बाद मैं मन ही मन वहाँ जाने को आतुर हो उठा था। जैसे उस दृश्य-वींणा में मुझे खो जाना सा था। लेकिन सुबह होते ही कॉलेज की दिन-चर्या में मन थोड़ा बँट सा जाता और फिर शाम होते होते वो भाव भी थोड़े मद्धिम से हो जाते। मैं अंदर ही अंदर रुक सा गया था। फिर एक दिन अगली सुबह...

करीब सुबह के साढ़े तीन बज रहे होंगे.. मगर चारो ओर छायी घने कोहरे के अंधेरे में वो रात ही थी। पल भर के लिए नींद टूटी ही होगी की वो  मंदिर से आती ढोल मंज़ीरों की आवाज़ कानो में समा सी गयी। आँखें बंद किए उस ठंडी रात में फिर से सो जाने की कोशिश की.. पर सो ना पाया। शायद उस ओर जाने की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी.. लेकिन उस रात के अंधेरे में वहाँ जा पाना भी दूभर ही था। फिर करीब चार बजे मैने कॉलेज के लाइब्रेरियन श्री पाठक जी को फोन लगा अपनी इच्छा बताई और उन्हें साथ चलने को राज़ी कर लिया। आधे घंटे बाद हम उस आती आवाज़ के सीध में थे... सीध इतना की मेन रोड होते हुए भी हम उस कोहरे भरी रात में सन्नाटे को चीरते हुए खेते-खेत एक शॉर्ट-कट रास्ते पे थे। गर्म कपड़ों के साथ माथे में वूलेन टोपी, वर्षों पहले मेरे दादाजी की दी हुई लाल-ईमली चादर लपेटे और एक हाथ में चाइनीस टॉर्च और पुलिसिया हंटर लिए मैं उस सफ़र में अति-उन्मादित था। उस वीरान खेतो, बगीचो और छोटे जंगलों को पारकर हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते ही जा रहे थे की... दूर से आग की लपते उठती नज़र आई.. पास आया तो देखा उस घने अंधेरे में कोहरे की चादर ओढ़े..   कुछ लोग बगीचे के बगल आग ताप रहे हैं। वो पहरा दे रहे थे.. अपने फसलों की..। पास आने पे उन्होने टॉर्च दिखाया और हमें रास्ता भी..। मगर वे आख़िर किस नव-ग्रह की  रक्षा में लगे थे.. पूरी रात उस वियावान जंगलों और खेतों के बीच..। और मैं भी अपने अनुभवों को टॉर्च दिखाता उन मेडों पे सजगता के साथ आगे बढ़ रहा था। आख़िर २० मिनिट पैदल चलने के बाद हम गाँव में प्रवेश कर ही गये.. आगे बढ़ने पे गाँव की कुछ महिलाओं व बच्चों को उस पगडंडी के दोनो ओर बैठा पाया। पाठक जी के निर्देश पे मैं अपनी सीध में नाक दबाए चला जा रहा था और दोनो ओर बैठी महिलायें अपनी नज़र बचाती जा रहीं थी। फिर गाँव के मध्य आके हम थोड़े पासचिं की ओर मंदिर की ओर चलने लगे। गाँव की कुछ महिलाओं को अपने परिवार के साथ माथे पे कलश लेकर भक्ति-भाव में डूब लोक-गीतों के साथ उसी रास्ते मंदिर की ओर जाते देखा और फिर हम उनका अनुसरण करने लगे..।

पौ फटते ही उषा-काल में हम उस नव-निर्मित मंदिर के सम्मुख थे। फिर थोड़ी देर मंदिर के परिसर को भ्रमण कर हम दुबारा गाँव की ओर ही रुख़ कर लिए। गाँव का नाम अरियांव था। मंदिर आते वक़्त ही मैने ये निश्चित कर लिया था की थोड़ी देर ही सही कुछ पल इस गाँव में ज़रूर बिताऊँगा। गाँव के पुराने मकानो में भी तो एक भव्य स्थापत्य नज़र आता है.. और वास्तव में इसी स्थापत्य ने ही भारत की भीतरी नीव को बचाए रखा भी है। पाठक जी के जान-पहचान वाले कुछ लोगो से मिलकर हम उस गाँव की एक लाइब्ररी जा पहुँचे। इस लाइब्ररी का नाम भी "विद्या-दान" ही था, जिसकी स्थापना वर्षों पहले मेरे कॉलेज के चेयरमॅन ने की थी। हमें आदर-पूर्वक बिठाया गया.. सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ उस लाइब्ररी के संग्रह को देख मैं विस्मित था। अध्यात्म और इतिहास के किताबों के साथ बांग्ला, हिन्दी और रसीयन साहित्य की किताबों को देख मैं अचरज में था.. और ख़ास कर इसलिए भी की वो मुझे उस गाँव में मिली थी। इन किताबो की मौजूदगी ही उस गाँव की प्राचीन भव्यता के पुख़्ता सबूत थे.. और वहीं मुझे पहली बार परमहंस योगानंद की "ऑटोबाइयोग्रफी ऑफ योगी " मिली थी। फिर उस गाँव से निकलते समय दिखे सुंदर नाक्काशी की हुई तीन-मजिली लकड़ी का घर..। कुछ पलों के लिए लगा इस स्थापत्य में कश्मीर के भाव दिख रहे हों..। लेकिन उचित रख-रखाव के कारण वो भी दम तोड़ रही थी। लौटते वक़्त बस मैं यही सोच रहा था की अगर मैं इस ओर रुख़ नहीं करता तो शायद इस नवग्रह की आभाओं से कोसों दूर ही रहता..।

 अभी अभी फिल्म "पीके" देखने को मिली। किसी नये ग्रह से आए एक एलीयन को भारतीय सरजमीन पे एक शोध-स्वरूप के रूप में। फिल्म ने कारोबार भी बहूत किया।उत्कृष्ट अभिनय और संवाद अदायगी भी कुशल निर्देशन के साथ बेहतरीन थी। मनोरंजन जी भर कर मिला। लेकिन क्या भारतीय उम्मीदों का बस ऐसे मनोरंजक फिल्मों से ही मरहम होता रहेगा। आप एक पात्र के माध्यम से दो देशों की भावनाओ को जोड़ने का तो प्रयत्न बड़ी मुस्तैदी से करते नज़र आते हैं लेकिन देश की छाती कहे जाने वाले प्रदेशों के खोखलेपन की पीड़ा को नहीं देख पाते। भोजपुर जैसे कितने ही प्राचीन भू-भागों में आज भी लोग बस मनोरंजन की पट्टी लगाते ही नज़र आते हैं। ज़रूरत है.. आपकी संवेदन श्रोतों का.. जो एक एलीयन बनके ही सही.. ज़मीनी हक़ीकतों से रूबरू तो हों।

Vinayak Ranjan



Tuesday, 4 November 2014

गुरुत्वाकर्षण में ब्रम्‍ह का दिख जाना...

   कुछ दिनो पहले की ही बात है.. समाचार पत्र के माध्यम से जान पड़ा की हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार श्री गोविंद मिश्र जी को उनकी कृति " धूल पौधों पे" के लिए के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा "सरस्वती सम्मान २०१४" से नवाजा गया है। करीब २० वर्षों के एक लंंबे अंतराल के बाद ये सम्मान पाने वाले.. वे प्रख्यात हरिवंश राय बच्चन के बाद दूसरे शख़्श् हैं। इस समाचार को पढ़ने के बाद ही.. एक पल के लिए मुझे लगा..  मानो मैं उनके निकट ही हूँ। सहसा सेल्फ़ पे रखे "वागर्थ" मासिक पत्रिकाओं के पुराने अंकों को टटोलने लगा। फिर एक अंक में प्रकाशित उनकी रचना "जीवन को पूरा नही पकड़ा जा सकता.." दिखाई दी। इसे मैंं कुछ माह पूर्व ही पढा था। मन ही मन आनंदित हो उठा.. ये जान कर की मेरा आभास तो सही ही था.. वो मेरे निकट ही थे। फिर देखा उनके नाम व उनकी लिस्टेड कृतियों के साथ उनका वर्तमान पता और मोबाइल नंबर भी नीचे अंकित है। फिर क्या था.. मैं तो अब उनके काफ़ी निकट ही था..।

एक लंबी साँस लेने के बाद मैने उस दिए मोबाइल नंबर पे फोन किया.. और फिर चार-पाँच रिंगो के बाद ही वृद्धावस्था की एक मीठी सी आवाज़ कानो में समा सी गयी। मैने उन्हें सर्व-प्रथम सरस्वती सम्मान के लिए बधाई दी और फिर अपना परिचय भी दिया.. वे गोविंद मिश्र ही थे। फिर हमारी बात- चित करीब १०-१२ मिनिट की रही होगी.. और फोन रखते ही एक अजीब सी शांति-छाया से खुद को घिरा देखा। जैसे लगा बातों-बातों में मेरे मंन की बातों की पुष्टि होती चली गयी.. और फिर लगा जैसे हम सब एक-दूसरे के कितने करीब पिरोए हुए हैं.. और हमें पता भी नहीं चलता। ये ब्रम्ह-दर्शन नहीं तो और क्या है!! हम जिस दृश्य-वीणा की गूँज को जग से सुनना चाहते हैं.. वो तो हमारे पास ही है। फिर तो मुझे इसी गुरुत्व में बैठना है.. और फिर हम जन्मोपरांत जिस भी गुरुत्व केंद्र की कक्षा में गये थोड़े उसी के अधीन हो गये.. ब्रम्‍ह की चाह में थोड़े ब्रम्हर्थि तो थोड़े ब्रम्‍हास्त्र हो गये। "सर्व-धर्म सम्भाव" वृहत आवरण के भीतरी चरम पे "सर्व-मान्य सम्भाव" के ब्रम्‍ह से भी तो स्वंय ही सिद्धि लेनी होती है।

साहित्य से थोड़ी बहूत अभिरुचि तो सभो को बचपन से ही रहती है.. चाहे हमारी भाषाएँ जो भी हो.. हम चाहे किसी भी धर्म या भौगोलिक भू-भागों से आतें हों। फिर या तो जीवन की अनेकानेक राहों में हम निकल भी पड़े हो.. लेकिन किसी भी विधा में हमसब अपने-अपने साहित्य की वृष्टि-छाया में खुद को भिंगोते ही रहते हैं.. चाहे वो हमारा आंशिक प्रतिरूप ही क्यों ना हो। ३१ अक्टोबर २०१४ को एक और खबर आई.. मश्हुर लेखक "रॉबिन शॉ पुष्प" के निधन को लेकर। मैं इस नाम से पहली बार मुखातिब हो रहा था। लेकिन जब हिन्दुस्तान दैनिक के स्मृति-शेष पन्ने में उनकी साहित्यिक जीवन-यात्रा से अभिभूत हुआ तो लगा मानो...  "ब्रम्‍ह-विस्तार" का रूप अदृश्य ही होता है क्या..? मेरे जैसे कितने ही पाठक होंगे जिन्होने शायद इस नाम को पहली बार सुना और देखा हो। लेकिन इन साहित्यकारों के नाम उस नभ-सभा में नहीं छाते जिस तरह अन्य सभाओं में छा जाने की एक होड़ सी मची है.. चाहे वो हमारी गरिमामय संसद की लोक या राज्य-सभा जैसी सभायें ही क्यों ना हो। काश कि इन साहित्यकारो व कलाकारों से सजी एक "कला-साहित्य सभा" ही बन पाती। उँचे कदो के बैनरों में आज के हमारे इन साहित्य सभा-सदों का भी चित्र उकेरा हुआ होता। कुछ प्रेरण शक्ति में इज़ाफा होता.. वैचारिक बेरोज़गारी घटती.. कुछ बोझ घटता.. कुछ आपका.. कुछ हमारा। 
http://www.khaskhabar.com/picture-news/news-prominant-writer-robin-shaw-pushp-no-more-1-27545.html

रॉबिन शॉ पुष्प के निधन पे फादर कामिल बुलके की एक प्रतिक्रिया जो पढ़ने को मिली.. " रॉबिन शॉ उन गिने-चुने ईसाइयों में हैं, जिन्होने हिन्दी साहित्य के संसार में भरपूर नाम कमाया। नि:संदेह श्री पुष्प आज हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कलाकार हैं- नुकीले अनुभव, खंडों के कुशल शब्द-शिल्पी, संवेदनाओं की जटिल ग्रंथियों के अनूठे कथाकार।"


क्या कभी संवेदनाओं के चरम को गुरुत्वाकर्षण के दो-धुरियों पे चलते देखा है..? आज भी वह स्मरण सहसा ही याद दिला जाती है.. उस सफ़र की..। बात कुछ दिनो पहले की ही है.. मगर उसकी सरज़मीनी जुड़ी रुदन वर्षों पुरानी..। हमेशा की तरह बक्सर के इंजिनियरिंग कॉलेज से शाम को लौटते वक़्त टूडीगंज स्टेशन पे अपने व्याख्याता मंडली के साथ बक्सर से पटना की ओर जाने वाली ट्रेन का इंतेज़ार कर रहा था। ठंड के दिनो में शाम भी जल्द ही हो जाती है। शाम के करीब साढ़े पांच बजे होंगे.. लाउड स्पीकर पे आवाज़ आई की ट्रेन डुमराव स्टेशन पे आ गयी है। फिर कुछ देर के बाद ट्रेन आई। मगर ये क्या..??  ट्रेन पूरी की पूरी खचाखच भरी हुई। ट्रेन के अंदर जाने की बात तो दूर.. दरवाजे पे भी पांंव रखना मुश्किल था। एक ख्याल आया की इस ट्रेन को छोड़ दूँ.. लेकिन फिर दूसरी ट्रेन तीन घंटे बाद ही थी। ये सोच मैं तेज़ी से प्लेट-फॉर्म पे आगे की ओर बढ़ने लगा.. की कहीं कोई गुंजाइश बने ट्रेन पेे चढ़ने की..। ताज्जुब हो रहा था.. की पिछले दो साल के अनुभव में इतनी भीड़ मैने पॅसेंजर ट्रेन में कभी नहीं देखी थी..। तभी आगे की एक बॉगी से एक वृद्ध महिला को ब्मुश्किल उतरते देखा.. फिर तेज़ी से आगे बढ़ उनकी लाठी को हाथों में लिया और अपने बाजू का सहारा दे.. उन्हें उतरने में थोड़ी मदद की..। उनके ठीक पीछे एक महिला भी उस खचाखच भरे ट्रेन से उतरने की जद्दोजहद में लगी हुई..। गोद में एक बिलखता बच्चा और साथ एक छोटी सी बच्ची भी। शायद वो उस वृद्ध महिला की रिश्ते में थी। मैने फिर उस छोटे से बच्चे को गोद में लिया और उन्हें भी उतरने में थोडी मदद दे पाया। ट्रेन भी अब प्लेट-फॉर्म छोड़ चूकी थी.. मैने थोडी हिम्मत दिखाई और झटके से गेट के हॅंडल को पकड़ अंदर की ओर जाने की कोशिश की.. की तभी मेरे एक लेक्चरर मित्र ने भी पीछे से जोड़ का दबाव बनाया.. और हम दोनो चलती ट्रेन में खुद को सुरक्षित पाए।

अंदर की भीड़ इतनी की जो जहाँ थे.. वहीं खड़े रह थे। मगर ये क्या..?? इक्का दुक्का पुरुषों को छोड़ महिलाओं और बच्चों की संख्या ही ज़्यादा थी। ग्रामीण पृष्ठभूमि के इस सफ़र में.. भोजपुरी लोक-गीतों से सज़ा ये कैसा भाव्य था..। मैं सबकुछ बड़े ही अचरज से बस देखे जा रहा था। बीच-बीच में छोटे स्टेशन और हॉल्ट पे उतरने चढ़ने के क्रम में महिलाओं की तू-तू मैं मैं भी.. "मछली बाज़ार" के दृश्य जैसा ही कुछ दिखा जा रही थी। उम्रदराज महिलाओं का एक बड़ा तबका जिन्हें जगह नहीं मिली.. वो ट्रेन के फर्श पे ही बैठ कर अपने रस-मंजूषा में लीन थी। कुछ वृद्ध महिलायें तो थकान के कारण वहाँ चलती ट्रेन के फर्श पे लेटने से भी गुरेज़ नहीं कर रही थी। घुरमुराए बालों, मटमैले कपड़ों और अलसाए मन को लिए ये किस उन्माद को लिए लौट रही हैं? दिव्य-शक्तियों को समेटे पूरा का पूरा दृश्य दुर्गा-काली शक्ति-वाहिनी के विहंगम स्वरूप से से कम ना था..। मेरे मन में भी सकारात्मकता के साथ कई प्रश्नो का प्रज्वलन अपने चरम पे तो था ही.. लेकिन जैसे मेरे इस अनुभव ने ना जाने कितने ही जवाबों के स्वरूप को भी अंजाने में देख लिया हो। लेकिन फिर भी मुझसे रहा नही गया.. और मैंने थोड़ी हिम्मत दिखाई और पास खड़ी एक महिला से पूछ ही बैठा.... की आप सब कहाँ से लौट रहीं हैं? फिर जो जवाब मिला वो वाकई हैरान कर देने वाला था.. इसलिए नही की उस कृत में धर्म और अध्यात्म का सार था.. बल्कि इसलिए की इतने कष्ट को उठा ये किस सिद्ध-सृजन में तल्लिंन हैं। " बेटा, लिट्टी-चोखा मेला खातिर गेल रही..।" इतना कह वो मुस्कुराने लगी थी.. और मैं अचरज में था। आख़िर इतनी विषम परिस्थितियों में भी ये कैसा गुरुत्व का आकर्षण था। वृद्ध-अधेड़ महिलाओं और बच्चों को छोड़ कोई भी नहीं था साथ उनके इस सफ़र में.. फिर उस भीड़ से निकला एक लोक-गीत जो अब तक मेरे कानों में गूँज रहा है..

"बेटा ना पूछे.. बाबू ना पूछे.. ना पूछे पिरितया हमार हो.."। ब्रम्‍हांड की इतनी पुरातन सभ्यता का ये कैसा रुदन था? आज भी इन अभिसप्त रुदालियो का कैसा क्रंदन है.. जिनके मर्म की स्पष्टताओं को भेदने वाला कूदाली शायद ही चल सके.. फिर राम की मैली गंगा.. मैली ही सही..।

इसी तरह के एक सफ़र में.. ट्रेन में एक रोज़ बक्सर ग्रामीण अंचल के  एक जुझारू व्यक्तित्व का भी साक्षात्कार मिला। बातों बातों में ही मेरी कुछ बातें उन्हें भी रोचक लगी.. और उन्होने मुझसे हिंदी कंप्यूटर टाइपिंग से रिलेटेड कुछ मदद भी माँगी। बक्सर स्टेशन पे उन्होने खादी के थैले से निकाल अपने भूभागीय डेवलपमेंट व सौन्दर्यीकरण से संबंधित अनेकानेक लेखों का जखीरा मुझे दिखाया। सब के सब.. कुछ यूँ कहें उस धरती की आवाज़ ही थी.. और बीते वर्षो के मेरे लेखों में भी ये बहुत कुछ परिलक्षित हो ही जाता है। वो वर्षों से अपनी इस आवाज़ को दिल्ली बैठे आला-कमान तक पहुँचाते रहे हैं.. और हस्र ये कि..  दिल्ली दूर जाते-जाते.. यहाँ के गुरुत्व स्वर ही गुम हो जाते हैं.. तो रुदन तो सुनने को मिलेगा ही.. एक ब्रम्‍ह के विज्ञान से कुछ कम तो नहीं..।


Vinayak Ranjan

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Sunday, 28 September 2014

" बीते कल को भी थोड़ी... श्रधांजलि... !!! "

जब मानव अपने जीवन के संघर्ष को लिए सफलता के शिखर को छूने का प्रयत्न करता है, तो हमेशा उसकी आत्मशक्ति ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का काम करती है... और वह सहसा अपने सफ़र की ओर बढ़ता चला जाता है| सफ़र.. बिल्कुल ही अंजाना सफ़र... जिसने ना जाने कितने दिन और रातों को देखा | दिन में वो जितनी जीवटता से एक नये आयामो के उत्सर्जन को तलाशता, तो रातें उन भावों को अपने आगोश में समेत सी लेती.. की कल फिर तुम्हें एक नये संकल्प लिए आगे की ओर बढ़ना है | फिर इन स्पस्ट संकल्प-साधनाओं का खुद में अवतरित होना भी तो एक चमत्कार ही है.. जब वो सभो के हितो को भी नज़रअंदाज़ ना करे| इन्ही संकल्प-साधनाओं ने अशोक और अजातशत्रु को सम्राट भी बनवाया था, लेकिन वहाँ भी तो साभों के हित कुचले गये थे, और फिर बुद्ध शरण को जाना पड़ा था और त्याग को ही अपनाना पड़ा था| आज भी इन भावों में बचपन में सिखाए गये मूल मंत्रों की ही ख़ूसबू आती है, जब दादी बड़े प्यार से कहती की तुम बड़े हो ना, तुम्हें तो त्याग करना ही होगा और यही सुख का साधन भी| बचपन में सिखाए गये रामायण और महाभारत के तत्वों में भी तो त्याग और संघर्ष की ही गाथा रचाई और बसाई गयी| और फिर जिन्होने ने इन मंत्रों को पिया और जीया... सच्चे पात्र तो वो ही बने और वो हो समरसता के वाहक भी बने | आज भी हमारे भारत के सभी समुदायों में ऐसे कितने उदाहरण मिलते हैं... जहाँ अपनी निजी सफलता को छोड़ लोगों ने अपने गावों कस्बों में जाकर विकाश के नये विकल्पों के मार्ग बने| जब आप अपनी प्रतिभा से न्यू-यॉर्क में और आपके प्रिय-मित्र मंडली कस्बे की चौक में हो तो अंतर के इस दंश का विष भी आपको ही कम करना होता है, और ये भी खुद में एक विशेष प्रतिभा का परिलक्षण ही तो है, जिसे हम आज के वैज्ञानिक  भाषा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स कह लें | ईश्वर को धन्यवाद की आज हम ग्लोब-लाइज़ेशन की कसौटी में जी रहें हैं, नहीं तो इन सामंती मारकों का विष और भी ज़्यादा तीक्ष्ण होता| इसमें अतिशयोक्ति का भाव कतई नहीं, की इन्ही भावों के कारण आज भी जिस विकाश के रफ़्तार से हम आगे बढ़ रहें है, हमारा सामना भी इन वादों से कुछ ज़्यादा ही हो रहा है, मानो आज भी सुर-असुर अमृत मंथन में लिप्त हों| और इस कड़ी में हम इस भाव मंथन साहित्य के सारथि बने रहें और अपने बीते कल को भी थोड़ी श्रधांजलि अर्पित करते रहें... !!!

विप्र प्रयाग घोष


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Tuesday, 23 September 2014

" दुर्गाशक्ति, दशहरा, दशानन... इति विश्‍वरूपम...!!! "

मौसम ने फिर दश्तक दे दी है| नयी शक्ति लिए माँ जग को जगा रही है| हम अंधेरे में ही जागने की कोशिश कर रहे है| पौ फटने के पहले फूलों को बटोर रहे हैं, की माँ के चरणो में इसे अर्पित तो करूँ, जीवन के भ्रम को थोड़ा तो दूर करूँ...| ऐसा ही है माँ दुर्गा की शक्ति और दुर्गा पूजा का पावन पर्व| हम सभो के लिए कुछ खाश| साल भर के जोश को मानो यहाँ पुनर्जन्म मिल जाती हो| फिर आज भी साथ अगर अपना बचपना हो तो फिर कहना ही क्या...!!! बचपन के रोमांच को फिर हम दोबारा तो जी नहीं सकते, लेकिन समय समय इसे उकेर तो सकते ही हैं| दुर्गा पूजा की हलचल तो महीने पहले से ही दिख जाती है|जो घर पे हैं तो घर के साफ सफाई का ख्याल, जो घर से दूर हैं उनके अपने घर जाने की हौसला आफजाई का ख्याल भी तो बराबर रखना पड़ता है| माँ दुर्गा की शक्ति है ही ऐसी, आप खुद में रह ही नहीं पाते| आज भी महालया के आते ही याद आता है, पिताजी का रेडियो को ठीक सुबह ४ बजे ही महालया पाठ के लिए ऑन कर देना|


फिर तरह तरह के फूल जिनमें हर-शृंगार, अर्हूल और भी ना जाने कितने फूलों को तोड़ पौ फटते ही दोस्तों के साथ घर को वापस आना| फिर दोस्तों के साथ मधुबनी पूर्णियाँ के ठाकुर बारी में बन रहे माँ दुर्गा की प्रतिमा को देखने जाना| सुबह सुबह ही माँ का पूजा घर को सजाना, पुरोहित जी का दुर्गा पाठ के लिए आना, फिर सामूहिक पुष्पांजलि के साथ शंख और घंटों को बजाना... वास्तव में यही तो है दुर्गा शक्ति का आहवान करना और इनके समीप जाना| फिर ज्यों ही सप्तमी, अष्टमी, नवमी के जागरण को हम देखते हैं, दुर्गा शक्ति स्वरूप दशहरा उत्सव में परिणत हो उठती है| फिर नये नये वस्त्रों में मेले की ओर निकलना| पूजा पंडालों में माँ दुर्गा के विहंगम स्वरूपों का योग होना, वहाँ मिले प्रसादो का भोग, फिर मेले में कुछ खरीद-दारी कर घर को वापस आते हैं| खिलौने, मिठाई और तरह तरह के व्यापार भी होते हैं|  देखते ही देखते ये उत्सव एक महोत्सव का रूप ले लेती है|



फिर इस महोत्सव में सभी संप्रदायों के लोग एक साथ... क्या बूढ़े क्या जवान और क्या बच्चे... अपने नये स्वरूप.. विश्वरूप को धारण कर दशानन " रावण" वध के द्वंश का भी तो आनंद लेते हैं| बुराई पे अच्छाई की जीत का भास कर अपने अपने घर को लौटते हैं.... और फिर उस महोत्सव के विश्वरूपम की छाया को लेकर ही अपने विश्व-कर्म की ओर निकल पड़ते हैं...

|| इति दशहरा... इति विश्व-रूपम...||

विप्र प्रयाग 

Thursday, 24 July 2014

विद्यादान एक्सप्रेस: बक्सर का तीसरा युद्ध और सिद्धाश्रम की सुध..!!!

    कुछ दिन हुए बिहार बक्सर जिले के बक्सर पटना रुट के टूडीगंज रेलवे स्टेशन पे खड़ा था। दोपहर के लगभग ढाई बज रहे होंगे.. की तभी रेलवे अनाउन्समेंट आई की पटना से बक्सर की ओर जाने वाली ट्रेन २ घंटे लेट चल रही है। मालूम हो कि.. ये ट्रेन कोई मेल या एक्सप्रेस नहीं.. ये तो एक पैसेंजर ट्रेन है.. और फिर इस छोटे से स्टेशन पे कोई एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनें रुकती ही नहीं.. और जो रुकती भी है तो उनका टाइम-टेबल से कोई लेना देना नहीं। तो बस.. यहीं से स्टार्ट होता है.. आज के बक्सर का तीसरा युद्ध।


बक्सर का पहला युद्ध २३ अक्टूबर १७६४ को ब्रिटिश ईस्ट-इंडिया कंपनी और बंगाल, अवध व मुगल सल्तनत की संयुक्त सेना के बीच हुआ था.. और लगभग इसी युद्ध ने.. ब्रिटिश हुक्मरानों को हिन्दुस्तानी सरज़मी पे अपने पाव पसारने का एक मजबूत आधार-स्तंभ भी दिया था।




 फिर शुरू होती है बक्सर की दूसरी लड़ाई.. भारत के आज़ादी के बाद.. अपने खुद के संवर्धन के लिए। लेकिन आज तक एक उचित मापदंड पे इस पौराणिक भू-भाग का कोई नया मसीहा अवतरित नहीं हो पाया। पटना और बनारस के मध्य शाहाबाद और भोजपुर की जनता और संसाधन बस अपना मुँह ताकते ही नज़र आते हैं। इस भूभाग को धान का कटोरा कहे जाने पे भी.. यहाँ की ग्रामीण जनता में असंतोष सहस ही दिख पड़ता है। 


  ..और हाँ ..जो थोड़ा बहुत संतोष दिखता भी है ..वो है उन पौराणिक और धार्मिक आस्थाओं के कारण ..जो आज भी यहाँ जीवंत हैं। पौराणिक काल से ही इस क्षेत्र को सिद्धाश्रम कहा जाता रहा है। कहतें हैं चौरासी अट्ठासी हज़ार ऋषि-मुनियों की ये तपोभूमि रही है.. और आज भी यहाँ की प्राकृतिक ऋचाओं में उस सिद्ध-द्रव्यों को देखा जा सकता है।

 राम-लक्ष्मण के गुरु विश्वामित्र की ये धरा रही.. तो महर्षि गौतम और दुरवासा की भी ये सिद्धपीठ रही। फिर तो शुभ-शक्तियों के साथ अशुभ-शक्तियाँ भी ताड़िका, मारीच, सुबाहु के रूप में इस हरितिम नैमिषारण्य में विराजने को सदैैैैव आतुर रहे। जहाँँ भगवान राम ने अपने गुरु सेवा में गंगा नदी की दिशा ही मोड़ दी थी, जो आज भी राम-रेखा घाट के रूप में स्थित है तो अहिल्या उद्धार की जगह अहिरौली के साथ... बक्सर युद्ध की कतकौली भी भारत के भाग्य की गाथा आज भी गाती नज़र आती है।

पटना और बनारस जैसे महानगरों के मध्य का ये भूभाग शायद आज भी उन भीष्म-शक्तियों की उपस्थिति से ही या तो अपने अतीत के सौंदर्य को बटोर पा रहा है.. या आज के डेवेलपमेंट प्रोग्राम में वर्षों पिछड़ता चला जा रहा है। कुछ दिन हुए मेरे छात्रों ने बक्सर युद्ध की उस जगह को चलती ट्रेन से दिखाया था। अब तो उस जगह एक बड़े स्कूल का निर्माण कार्य भी चल रहा है। फिर दिखे उस इलाक़े की हरी-वादियों में विचर रहे... हिरणो और मृगों का विहंगम झुंड..। मैं घोर .आश्चर्य में था। उन मृगों में कुछ कृष्ण-श्याम मृग भी थे। ये बस इस सिद्ध-पीठ की मानवीय आस्था ही है.. जो आज भी ये अपना जीवन बचाए रखने में कायम हैं। बरबस एक ख्याल आया की भारत सरकार इस क्षेत्र को जैविक उद्दान के रूप में विकसित क्यों नहीं करती है.. कम से कम इसी बहाने लोगों को इस ओर आने की रोचकता तो बनी रहेगी और इसके साथ न जाने कितने डेवेलपमेंट प्रोग्रामों को अमलीजामा पहनाया जा सकेगा।

    सावन के इस महीने में आरा और बक्सर के बीच रघुनाथपूर के उत्तर अवस्थित ब्रम्हपुर के अपरूपी सिद्ध बाबा बरमेश्वर नाथ शिव मंदिर का दिव्य दर्शन भी हो पाया। कहा जाता है.. बनारस के काशी विश्वनाथ और देवघर के वैद्यनाथ धाम के मध्य का ये एक अलौकिक सिद्ध-पीठ है। फिर जो मंदिर के उस प्रांगण में पाया वो वर्ष २००४ के IIT Guwahati के QIP (Quality Improvement Programme)  के दौरान देखे गये.. कामरूप कामाख्या मंदिर के प्रांगण से कम न था। संतुष्टि थी के बहूत दिनो बाद खुद के साक्षात को वृहत होते देख पाया। यहाँ आने का सुख जो भी मिला हो... लेकिन यहाँ से जाने की जैसे कोई समय-सारिणी पट्ट ही गायब कर दी गई हो.. मानों इस सिद्ध-क्षेत्र का प्रभाव प्रबल हो चला हो।


टूडीगंज स्टेशन के यात्री विश्रामालय के दीवार पे खुदी रेलवे समय-सारिणी इसकी गवाह है।एक तो समय सारिणी १० साल पुरानी और पूर्व की ओर जाने का पट्ट दीवार से उखड़ा हुआ। पटना-बनारस रूट पे आज भी इंडियन रेलवे ही आवागमन का सर्वोत्तम साधन है।लेकिन अस्वस्थ दिशा-निर्देशों की वजह से विकास की गति धीमी है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले नव-पाठकों को अगर समय पे ट्रेनो की सुविधा मिल जाए तो बिहार के बच्चों को अन्य राज्यों का मार्ग न पकड़ना परे। मेरे दस वर्षों के अध्यापन अनुभव में बिहार में इंजिनियरिंग कॉलेज की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुई है तो वहीं स्टूडेंट के अड्मिशन इनपुट अपेक्षाकृत घटे हैं। जिसका सीधा संबंध हमारी लचर राजकीय व्यवस्थाओं और छात्रानुरूप माहौलों से है। फिर वे क्यों करें आपकी राजकीय इंजिनियरिंग अलाइयेन्स की कद्र। फिर तो अब गाँवों और कस्बों को बाँधने की बारी है.. नगर वाले तो महानगर देखते हैं। अब कृपया पॅसेंजर के साथ सूपरफास्ट ट्रेनो को भी इन विद्या-स्थलों पे ज़रूर रोकें... तो ऐसे ग्रामीण वनस्थलियों में पड़ने वाले विद्यालयों को ऐसे बहुमूल्य दान भी चंदन रूपी विद्यादान एक्सप्रेस बनते नज़र आयेंगे।

 सुबह ७ बजे के करीब आरा स्टेशन पे फरकका एक्सप्रेस का इंतजार कर ही रहा था की.. लाउड-स्पीकर पे शहनाई वादन के साथ घोषणा हुई की प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त के द्वितीय हफ्ते को संस्कृत सप्ताह मनाने की विधिवत घोषणा की.. और फिर संस्कृत के मंत्र मानो सामूहिक उपचार में संलग्न हो उठे हो.. और मेरा अगला पड़ाव भी ब्रम्हपुर शिव-धाम ही था.. जिसकी राह रघुनाथपुर स्थित संत-महाकवि तुलसीदास के तुलसी-स्थान के सम्मुख ही गुजरती है। कहते हैं तुलसीदास जी भारतीय आध्यात्म की नगरी काशी-वाराणसी-बनारस को छोड़ अगर पूर्व की ओर रुख़ करते तो अक्सर उनका दूसरा निवास बक्सर का रघुनाथपुर ही होता और उन्ही के दिव्य स्मरण को लिए इस जगह का नाम उस समय के प्रसिद्ध और महादानी राजा रघुनाथ सिंह के नाम पर... संत तुलसीदास ने ही इस जगह का नामकरण रघुनाथपुर कर दिया। नहीं तो पहले दो गाँव "बेला" और "पत्र" के कारण इस जगह का नाम "बेलापत्र" ही था।  कुछ दिन हुए फ़ेसबुक पे बक्सर डुमराव के मेरे एक छात्र ने महान शहनाई वादक भारत रत्न बिस्मिल्ला ख़ान के पुण्य तिथि २१ अगस्त पे कुछ अपडेट दिया... जान पड़ा ख़ान साहब का जन्म २१ मार्च १९१३ को बक्सर के डुमराव राज में हुआ था। उनके वालिद महाराजा भोजपुर-डुमराव दरबार के खानदानी शहनाई वादक थे। ६ वर्ष की उम्र में ही उन्हें बनारस उनके चाचा अली बख़्श विलायतू के पास भेज दिया गया जो बनारसी घराने के विख्यात शहनाई वादक होने के साथ-साथ उनकी आध्यात्मिक घनिष्टता काशी विश्वनाथ मंदिर से काफ़ी थी। आरा स्टेशन पे सुनी गयी शहनाई की धुन बरबस कानो में गूँज रही थी..."गूँज उठी शहनाई " की तरह..।

...और बरबस ऐसी ही माधुर्य गूँज लिए हर कोई आज भी यहाँ के आध्यात्मिक व ग्रामीण दर्शनो से जुड़ने की कोशिश में लगा रहता है। मुझको भी अब इस परिदृश्य में आए लगभग दो साल होने को आए। महानगरों की भागा-दौरी से अलग हरियाली की चादर ओढ़े इन वादियों में ही शिक्षण अधिक भाता है। प्रकृति की गोद में बैठ अपनी ऊर्जा को अपने वश में पाता हूँ। जीवन के शोध-रूपी युद्ध से परे इसकी सटीक समीक्षा ही एक पवित्र सुध के समान है। तो फिर अब क्या बचा है... इसे देने को..? मन में ये ख्याल बार-बार आता है। फिर से नये नये महानगर बसाने के कयास लगाए जा रहे हैं। बुलेट ट्रेनो की दौड़ भी लगने वाली है। फिर भी क्या इन प्रयत्नो से हम भारत की आत्मा को जगा सकतें हैं..? हाँ, अब बहूत सारी सरकारी योजनाओं के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों के पक्कीकरण का काम तेज़ी से हुआ है। लेकिन उन सड़कों में खुश-मिज़ाज आवाजाही का ज़रिया  आज भी नहीं बना। आज भी रोजमर्रा के कामो से आने जाने वालों लोगो और विशेषतः स्कूली छात्रों को छोटे-छोटे प्राइवेट  टेंपो या मिनी बस का ही सहारा लेना पड़ता है। तो फिर क्यों ना ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे भू-भागों को कलकत्ता में चलने वाली ट्राम-रेलों के नेटवर्क से जोड़ दिया जाए.. आम-जनो में नये उत्साह के लिए। ट्रामों के उस प्रकृति-पूर्ण सफ़र से शायद कुछ कवित्त व लेखन भावों को भी बल मिल पाए।सड़कों की मजबूती के साथ विद्दुति-करण योजनाओं के नये प्रारूपों को भी पटल पे लाया जा सकेगा। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस भू-भाग में सौर-उर्जा के अलावा धान-भूसी उर्जा के उत्सर्जन और संवर्धन को भी विशेष बल मिल पाएगा..। यहाँ तक की ट्राम पटरियों पे बड़ी आसानी से छोटे बग्घी-नुमा गाड़ियों को भी यहाँ पाए जाने वाले उन्नत नस्ल के घोड़ों और बैलों से चलाया जा सकेगा। पशु-संवर्धन की नीतियों के तहत बड़ी आसानी से दुग्ध विक्रेताओं को भी बड़ी आसानी से बाज़ार के नज़दीक सुलभता के साथ लाया जा सकेगा। कम से कम बनारस से सटे भू-भागों पे तो ऐसे एक्सपेरिमेंट किए ही जा सकते हैं.. फिर तो ऐसे प्रयासों की गूँज भी शहनाई और बाँसुरी से कुछ कम नहीं।




 "आपन देशो त अमेरिका-चीन.. अउर जापान बने के बानी.."  इति विद्यादान एक्सप्रेसम... 


http://en.wikipedia.org/wiki/Brahmapur,_Bihar
http://en.wikipedia.org/wiki/Tulsidas
http://en.wikipedia.org/wiki/Bismillah_Khan

Vipra Prayag Ghosh

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Saturday, 12 July 2014

झाल-मूरी इंडिया....

दिनभर की दैनिक प्रक्रियाओं और थकान के बाद.. मिजाजी तबीयत को भी दुरुस्त रखना ज़रूरी होता है.. तो अपने तबीयत के  इस सूखेपन को हरा करने निकल पड़ा | बड़े शहरों की गूँज और उँचे-उँचे अपार्टमेंटो के आगे तो दम ही घूट जाए| फिर इस शाम जाऊं तो जाऊँ.. कहाँ.. |  ..तो अचानक याद आया वो पुरानी झाल-मूरी की दुकान..| झाल-मूरी के साथ-साथ यहाँ.. रोजमर्रा की वो सारी चीज़ें मिलती हैं.. जो कभी हमारे घर पे बना करती थी.. लेकिन अब तो वो सेटेलाइट शान के खिलाफ है.. तो फिर पहले वाली "मदर-इंडिया" के जमाने की बात भी नहीं रही..| अब तो हर वो चीज़ रेडी-मेड ही आपके बाजार में उपलब्ध है.. लेकिन घर वाली वो बात कहाँ...| जी हाँ.. अब खाने वाली वो "बरी"  और "तिल-बरी" कितनो के घरोंं पे बनती होगी... या फिर चूल्‍हे पे चढी मिट्टी बर्तन के गर्म बालू पे कौन मेहनत कर चावल, चना और मकई को भूंजने बैठता होगा..| तो समझ लीजिये यहाँ सब कुछ मिलता है..   चना-जौ की सत्तू से लेकर चूड़ा मूरी और तिल के लाई तक.. फिर कह सकते हैं ना इसे भी आप... अपने गॉव के स्वाद का अध्यात्म..| जी हाँ.. बेशक आप बने ही इन स्वादों से हैं.. और आपकी भारतीयता आज भी आपके स्वादों के कारण ही बची हुई है| पटना का वो दुकान वाला बड़े फक्र से कहता.. "हमर दुकान के समान त अमिरका-जापान के दूरी तय करत है.. बबुआ.."|  ...लेकिन मेरे दिल को जो भाता वो है उस दुकान की झाल-मूरी..| झाल-मूरी  हम सभो के स्वाद की ऐसी पसंद..जो शायद ही भारत के किसी छोर पे ना पाई जाती हो| हाँ, देश के अलग-अलग जगहों पे बनाई गयी तरीकों में कुछ भिन्नता पाई जाती हो.. मगर है तो वह इंडिया की नंबर वन "झाल-मूरी" ही..|

अगर आपके सफ़र के दौरान ये सामने दिख जाए तो जेब के सिक्के आपके मिज़ाज बनाने को मचल   ही निकलते हैं| भारतीय मिज़ाज को भाती सस्ती और सुलभ स्टार्ट-टर.. थोड़ा मटर तो थोड़ा टमाटर भी.. कटे प्याज.. कटे नारियल और तीखी मिर्च के साथ..और थोड़ा दाल-मोट भी..मूरी के साथ| इसे आप मुरही तो मुढी भी कहते हैं.. कहीं कहीं इसे मूर-मूरे भी कहा जाता है.. तभी आप बाज़ार के तीखे और दिल खूश कर देने वाले "कूर-कुरे" के भी मुरीद बन जाते हैं.. तो फिर हल्दीराम भुजिया और मिक्शरों के भी| घर पे बनाई आलू फ्राइ और चिप्स.. बड़े रेस्तरॉं और होटेलों की मेनूओं में फिंगर फ्राय और  ब्रांडेड चिप्स बनी ज़्यादा शोभती हैं.. और आपके सुलभ बजट की अठन्नी की आलू..१० से १०० के नोट निकाल ले जाती है| ..क्यों है ना ये इंडिया की रियल मशालेदार और चटपटी झाल-मूरी..|

विगत कुछ वर्षों में रोजाना ट्रेन के सफ़र में.. कुछ खाश स्टेशनो पे  लुभाते टाइम-पास भी मिलते दिख जाते हैं.. तो इन्हे बेचने वाले सेल्समन की व्यग्र-उत्कट इच्छाशक्ति भी..| कितना जोखिम लिए.. ये हर-दिन आपके मिज़ाज को बनाए रखने में तत्पर नज़र आते हैं.. और आपकी यात्रा आपकी मन मुताबिक  मिले सुखद सफ़र की अनुभूतियों में खो जाती है| पटना बिहटा के आगे आरा से आगे बढ़ने पर... चना-ज़ोर गरम बाबू.. मैं लाया मजेदार वाला वो मनोज कुमार की क्रांति फिल्म का गाना सहसा याद आने लगता है तो शत्रुघ्न सिन्हा के साथ हेमा मालिनी भी..| जी हाँ.. यहाँ का चना-ज़ोर गरम.. हैं वाकई में काफ़ी गरम.. नहीं पड़ने देता आपके मिज़ाज को नरम..| आख़िर है भी तो ये बाबू कुंवर सिंह की धरती ना..| ये बस इस जगह की भारतीय चने का ज़ोर ही है की आज भी यहाँ के अविकसित इलाक़ों में रहने वाली सभ्यता.. दिन के दो वक़्त में एक वक़्त.. गॉव के लहजे में इसे बकत की कहलें.. घर पे बनाई उन्ही चावल चूड़ा चना के  भुज्जे से ही थोड़ा सरसों का तेल, प्याज और मिर्च के साथ बड़े मज़े से अपने अध्यात्म में रमते नज़र आते हैं| एक बार बक्सर के अपने अनुभव में.. वहाँ के इंजिनियरिंग संस्थान के चेयरमॅन के सौजन्य से लोकल गन्ने से बने "गुड़" और "शुद्ध घी" के सम्मिश्रण का भी स्वाद मिला.. फिर तो जैसे आपके स्वाद की भी रिसर्च होती दिखने ही लगी| जहाँ गॉव घरों में रोजाना की मिठाइयाँ नहीं आती तो लोग इन्ही पुराने तरीक़ो के दुर्लभ स्वादों से खुद को जोड़े रखते हैं.. क्यों है ना असली झाल-मूरी इंडिया..|

कंप्यूटर साइन्स एंड इंजिनियरिंग निहित Algorithmic Computation मोड्यूलों के विषयवार अध्यापन और शोधों में Travelling Salesman problem टॉपिक की टेक्निकल वर्णनो को भी सर्व-प्रथम दैनिक जीवन में मिलने वाले इन्ही चलंत सेल्समन रूपी "सन ऑफ इंडिया" के उदाहरणो से ही छात्रों को रूबरू करवाना होता हैं.. तो फिर ऐसे चरित्रों से झाँकता दिखता है.. भारत के महान शिक्षाविद साहित्यिक रबींद्रनाथ टागॉर का "काबुलीवाला" भी...
http://en.wikipedia.org/wiki/Travelling_salesman_problem
http://www.angelfire.com/ny4/rubel/kabuliwala.html

काबुलीवाला, एक ऐसा जीवन चरित्र..जो अपने देश अफ़ग़ानिस्तान से काजू-किशमीस बेचता.. काबुल से कलकत्ता आता है.. फिर एक छोटी सी बच्ची में अपनी छोटी सी बेटी के बालपन को ढूँढने लगता है.. फिर विषम परिस्थितियों में मिले विश्वासघात के कॉप और अपने सम्मान के बचाव में दस वर्षों के कठोर कारावास को चला जाता है.. तो फिर वर्षों बाद मधुर यादों को सजोकर अपने घर..काबुल को लौटता है..| इन संस्मरणो में जहाँ एक साहित्यिक भाव आज भी जागता नज़र आता है तो.... ऐसे ही कुछ बचपन के यादों से हर कोई जीवन प्रयंत पिरोया हुआ भी रहता है..| मेरे बचपन के दिनो का वो हर सुबह को आनेवाला "पॉव-रोटीवाला" जिसके  ग्रामीण बांग्ला गीतों को हम हर दिन सुना करते.. तो भरी दुपहरी में "ए..रसगुल्लई.." की आवाज़ लगाता वो बूढ़ा रसगुल्लावाला भी तो आज भी याद आतें हैं.. तो हर शाम को चना-चूर लेकर आता "मुगलई टोपी" पहने.. वो झाम-लाल भी..| ऐसे स्मरण आज भी आपके झाल-मूरी इंडिया के सुखद माइल-स्टोन बने ही नज़र आते हैं.. जिनके जात और धर्म से हमें दूर-दूर तक कोई लेना देना नही था| बस वो आते और कुछ ही पलों में  खूशियाँ बिखेर गुम हो जाते..|

नागपुर के अपने विद्यार्थी जीवन में कलकत्ता से नागपुर जाने के दौरान.. एक स्टेशन आता  था.. झारसुगड़ा, ओड़ीसा का एक इंडस्ट्रियल सिटी..| ये स्टेशन पौ फटते ही सुबह-सुबह आता.. और मेरा सर सहला जगाने का काम करते.. दो छोटे-छोटे मासूम से बच्चे..| पता नहीं मेरी इन यात्राओं में... ये कैसे मुझे पहचान से गये थे.. जबकि मैं हर ६ महीने बाद ही ट्रेन की यात्रा कर पाता था| फिर पता चला बर्थ के नीचे रखे कतरनी चावल की बोरी देख ही वो मुझे जगाते.. जो मेरी लंबी यात्रा की एक Grand-Father testing नीतियों के तहत ही.. हर बार मुझे नागपुर ले जाने के लिए दे दिया जाता था| ... पर ट्रेन की यात्रा में मिलने वाले उन बच्चों का मैं कायल हो गया था.. दोनो भाई बहन थे.. उम्र महज ७-८ साल रही होगी दोनो की..| दोनो सुबह-सुबह वहाँ के जंगली सूखे बेरों को लिए चढ़ते..फिर ट्रेन की साफ-सफाई करते.. लोगों को कला-बाजियाँ दिखाते.. नये-नये गाना सुनाते.. अपने बेरों को बेचते.. और फिर २-३ घंटे बाद यात्रियों से पैसे कमाकर किसी स्टेशन पे उतर जाते..| उनके भावों से मैं हैरान हो जाता था.. इतनी कम उम्र में उनकी निडरता देखते ही बनती थी.. फिर ऐसा ही बहूत कुछ "Slumdog Millionaire" मूवी में भी देखने को मिली थी..| घर से बाहर निकलते ही.. आपको झाल-मूरी इंडिया के कीचड़ में खिले इन फूलों का दर्शन अनायास ही हो जाता होगा.. तो फिर ज़रूरत है इन सस्ते बजट वाले जीवन- अंशों को भी एक मँहगे भाव से देखने की...|





झाल-मूरी इंडिया... Continued...


Vipra Prayag 

Saturday, 5 July 2014

सफ़र का नया साथी....वागर्थ

   उम्र के साथ आपकी प्रवृतियों के भी रूप बदलने से लगते हैं.. हमेशा की तरह.. इस बार पूर्णियाँ आर एन साव चौक वाले बुक स्टॉल के सामने था.. फिर तो बचपन से ही कुछ ना कुछ पढ़ने व गढने की आदतें आपका पीछा भी बड़ी आसानी से नहीं छोड़ा करतीं। बचपन के दिनो में चाचा चौधरी, पिंकी, रमण की कॉमिक्स से लेकर मनोज पॉकेट बुक्स की राम-रहीम, क्रूक-बॉन्ड.. कभी मधु-मुस्कान लोट-पोट.. तो कभी चंपक-नंदन.. अमर चित्रकथाओं का दुर्लभ संसार..फिर इंद्रजाल कॉमिक्स का मॅनड्रेक और वेताल वन का फॅनटम.. और नागराज के कारनामे..। और फिर स्कूली दिनों से निकल कॉलेजिया उम्र १९९२ से स्पोर्ट-स्टार मॅगजिन का अनवरत संग्रह-कोष.. आपके मनोरूपी सफ़र के साथी तो बनते ही हैं.. और फिर भी जैसे पढ़ने की ललक ख़त्म होती नहीं दिखती। ..पर जीवन के इस मोड़ पे एक नये साथी ने अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने का काम जो किया.. वो भारतीय भाषा परिषद से प्रकाशित "वागर्थ" मासिक पत्रिका रही.. अपने समकालीन कथा साहित्य और प्रेमचंद का भारत विशेषांक के साथ..।

..वागर्थ के इस अंक के अंतिम पेज पे छपी कुछ पंक्तियों का ज़िक्र करना ज़रूरी है। ये शब्द ब्रिटिश प्ले-राइटर, नॉवेलिस्ट सॉमर्सेट मोंम के हैं.. "जब मैं भारत छोड़ रहा था, तो लोगों ने मुझसे पूछा की भारत में मुझसे सबसे अधिक किस बात ने प्रभावित किया, लेकिन मुझे प्रभावित करने वाली चीज़ों में न ताजमहल था, न बनारस के घाट। न मदुरै के मंदिर और न त्रावणकोट के पहाड़। ऐसा नहीं की मैं इन सबसे प्रभावित नहीं हुआ था, लेकिन जिसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था, वह था- भारत का किसान, दुबला-पतला। जिसके पास अपना तन ढँकने के लिए एक मोटी धोती के अलावा कुछ नहीं था। जो सुबह से शाम तक चटकती धूप में धरती को जोतता है, दोपहर में पसीने से नहाता है और शाम को डूबते हुए सूरज की किरणो की तरह परिश्रम से थककर सो जाता है। और ऐसा वह आज से नहीं; बल्कि उस समय से कर रहा है जबकि आर्यों ने इस धरती पे कदम रखा था। सिर्फ़ एक आशा उसके मन में काम करती है की वह इसी परिश्रम के बल पर अपने को जिंदा रखने की एक छोटी सी ज़रूरत, पेट भरने की, पूरी करता रह सकता है। "
http://en.wikipedia.org/wiki/W._Somerset_Maugham

वागर्थ के इस अंक में हिन्दी साहित्य के नये-पुराने धुरंधर महारथियों के लेखों-कहानियों के बाद सॉमर्सेट मॉम की भाव्य उपस्थिति.. इस बात का संकेत है.. की साहित्यिक-अभिव्यक्ति आपके भौगोलिक या औपनिवेशिक आवरणो से परे ही है।आज के शहरीकरण और पूंजीवादी व्यवस्था के बीच से झाँकती भारत की ये तस्‍वीर.. क्या बस उस जमाने की है.. या आज के अंक में इसकी मौजूदगी.. आज भी इसके जीवंत अंशों का अहसास करवा रही है। इसे आज़ादी के बाद से चले आ रहे.. मिलते आघातों का दर्द कहें.. या बनते विश्वासघाती तंत्रों के मंथन का विषय..। कहीं ऐसा तो नहीं की इन ज़मीनी शक्तियों की अवहेलना के कारण ही.. भीतरघाती विनाशलीलाओं का विषपान भी रह रह कर भारतीय समाज को करना पर रहा है।

सॉमर्सेट मॉम के ये शाब्दिक विचार आज भी ब्रिटिश कालीन निर्मित उन भव्य भवनो और संसाधन सदृश ही हैं.. जिन्हें आज के परिप्रेक्ष्य में अगर समय रहते संरक्षित कर लिया जाए.. तो आज के भारतीय डेवेलपमेंट मॉडेल को उचित मानको पे खड़ा उतारा जा सकता है.. चाहे वो खेतो में पसीने बहाता एक परिश्रमी किसान के पुनर्जागरण के लिए ही क्यों ना हो। चीन देश के किसान और उनकी कृषि पद्धति अपने देश से दूर अफ्रिकन देशों में जाकर नये आयामों को पुनर्जीवित और पुनर्गठित कर रही है तो हमारे किसानो के समस्याओं की पुनरावृति भी नियमतः संभव नहीं है। ..पीछे से कुछ पन्नो को उलट आगे बढ़ा.. तो.. हरिशंकर परसाई की " भारत को चाहिए जादूगर और साधु" लेख पढ़ने को मिली। खुद को इन महान आत्माओं की कृतियों से अंगीकृत करते हुए जो कुछ पढ़ने को मिला-

"..अंत में इस निर्णय पे पहुँचा की अन्न नहीं 'आनंद' ही ब्रम्‍ह है। ...पर भरे पेट और खाली पेट का आनंद क्या एक-सा है? नहीं है, तो ब्रम्‍ह एक नहीं अनेक हुए। यह शास्त्रोक्त भी है-'एको ब्रम्‍ह बहुस्याम'। ब्रम्‍ह एक है, पर वह कई हो जाता है। एक ब्रम्‍ह ठाठ से रहता है, दूसरा राशन की दुकान में लाइन से खड़ा रहता है, तीसरा रेलवे के पुल के नीचे सोता है। ...सब ब्रम्‍ह ही ब्रम्‍ह है। ..शक्कर में पानी डालकर, जो उसे वज़नदार बनाकर बेचता है,  वह भी ब्रम्‍ह है और जो उसे मजबूरी में खरीदता है, वह भी ब्रम्‍ह है। ..ब्रम्‍ह, ब्रम्‍ह को धोखा दे रहा है। ...साधु का यही कर्म है कि मनुष्य को ब्रम्‍ह की तरफ के जाय और पैसे इकट्ठे करे; क्योंकि 'ब्रम्‍ह सत्यं जगन्मिथ्या'। ..२६ जनवरी (१९७२) आते-आते मैं यही सोच रहा हूँ कि, 'हटाओ ग़रीबी' के नारे को, हटाओ महँगाई को, हटाओ बेकारी को, हटाओ भूखमरी को, क्या हुआ? ..बस, दो तरह के लोग बहुतायत से पैदा करें- जादूगर और साधु। ..ये इस देश की जनता को कई शताब्दी तक प्रसन्न रखेंगे और ईश्वर के पास पहुँचा देंगे। ..भारत-भाग्य विधाता। हममें वह क्षमता दे कि हम तरह-तरह के जादूगर और साधु इस देश में लगातार बढ़ते जाएँ। ..हमें इससे क्या मतलब कि 'तर्क की धारा सूखे मरुस्थल की रेत में न छिपे' (रवीन्द्रनाथ) वह तो छिप गई। इसलिए जन-गण-मन अधिनायक! बस हमें जादूगर और पेशेवर साधु चाहिए। तभी तुम्हारा यह सपना सच होगा कि हे परमपिता, उस स्वर्ग में मेरा यह देश जाग्रत हो। (जिसमें जादूगर और साधु जनता को खुश रखें)। ... यह हो रहा है, परमपिता की कृपा से! "

हरिशंकर परसाई की इस लेख के कुछ अंशो को पढ़ मैं रुक सा गया था। ..जादूगर और साधु के इस भाव ने मुझे दोबारा बक्सर के खेतों और खलिहानो में जो दौड़ा दिया था।अपने बक्सर इंजिनियरिंग कॉलेज के कार्यकाल के दौरान.. हर दिन के शाम के वक़्त मैं हाथ में कॅमरा लिए..आसपास के खेतों और खलिहानो में चला जाता था। फिर कभी उन खेतों में लगे गन्नो को तोड़ मीठे रसों का रसास्वादन.. तो कभी जगह जगह बने ब्रम्‍ह-स्थलों का दिव्य-अवलोकन। कॉलेज के चारों ओर बसे बसाए गाँवो से निकलती कच्ची पगडंडिया जो मेन-रोड पे आ मिलती। ..और फिर इन्ही पगडंडीयों से निकलती ग्रामीण वेश-भूषा से सुसज्जित मानवीय आभायें। शादी-ब्याह में पाई जाने वाली पुराने जमाने की पालकी को मैने आज भी इन गावों में विरजते देखा था.. तो कभी जंगली खरगोशों की एक के पीछे एक की लंबी कतार.. तो कभी टांय-टांय करते तोतों और खलिहानो में कदमताल करते भेंडो का विहंगम समूह..। ग्रामीण और वन्य-संसाधनो की इसी खूबसूरती ने ही मुझे यहाँ खींचा था। आज भी याद है.. जब मैं पहली बार यहाँ इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था तो.. खेतों में चरते नील-गायों के समूह को देख लगा मानो.. मैं किसी फोरेस्ट रेंज में तो नहीं आ गया। ..फिर एक पुराने नाले के बगल से निकलता भयावह कर देने वाला.. विशालकाय गोह..भी दिखा था.. इन्हें आज के डिफिनेशन में लिटिल डाइनॉसॉर ही कहलें..। मैं आश्चर्य में था..कि "धान का कटोरा" कहे जाने वाले इस भूभाग में आज भी इन जीवों की जादुई उपस्थिति मौजूद है।

 
..तो कुछ दिन यहाँ बिताने पर यहाँ के ग़रीब किसानो का साधुई दर्द भी दिख ही गया। नील-गायों की बढ़ती संख्या ने इनके खेत खलिहानो में नज़र सी लगा दी है.. बहूत कुछ मारीच-सुबाहु दानवों की तरह..। पूछने पे पता चला की विगत कुछ वर्षों पहले इन्हें कहीं से ट्रक गाड़ियों पे लादकर यहाँ छोड़ा गया था.. जिनका दृश्य आज त्रहिमाम कर देने जैसा है.. अच्छी-ख़ासी फसल चट कर जाते हैं। इन्हें ये भगा भी नहीं सकते.. ना तो मार ही सकते हैं.. अब तो ये आस्था से जो जुड़ गई है. एक बार मैने बड़े प्रोफेशनल अंदाज में कहा था..-"गाय है तो दूध तो देती ही होगी.." जवाब मिला.."पकड़ में आए तब ना.." .."नहीं तो बांग्लादेशे भेजवा दो.. चमरिए कुछ काम में आ जाए.."। ...फिर तो ऐसी बातों से आप बस खुद को ही थोड़ा बहला सकते हैं। यहाँ के नीलगायों की समस्या अब राजनीतिक रूप भी लेने लगी है। समाचार पत्र से जो जानने को मिला था कि पिछले साल औरंगाबाद के गावों में हैदराबाद के नवाब को बुलाया गया था.. कुछ उत्पाती नीलगायों को मारने के लिए.. आख़िर जादूगरी का लाइसेन्स हर किसी को कहाँ मिलता यहाँ..।  हर बनती सरकार देश की बाहरी सीमाओं की रक्षा को प्रतिबद्ध नज़र आती है.. रक्षा सौदों के मद्देनजर..पर आत्मीय सुरक्षा और वो भी जब बात ग़रीब किसानो के हित में हो तो... सारी प्रतिबद्धतायें साधुई रुख़ लेने सी लगती हैं। आज भी हम बड़ी बड़ी तकनीकी संस्थाओं में पढ़ाई जाने वाली लेटेस्ट टेक्नालजी की बात करते हैं... लेकिन इन आंतरिक समस्याओं के प्रति सरकारी जादूगरी नही चल पाती। GIS and Remote Sensing Forest application के ज़रिए हम ऐसी कितनी ही समस्याओं का निदान कर सकते हैं.. लेकिन हमें हमारे आंतरिक मामलों को साधुई रूप दे..हवाई-यानो की जादूगरी जो सिद्ध करनी है... आगे भगवान मालिक..।
http://remote-sensing-biodiversity.org/zsl-symposium

....फिर वागर्थ के इन पन्नो में अपने फणीश्वरनाथ रेणु की "नैना जोगिन" पढ़ने को मिली..और संतुष्टि भी.. कि साहित्यिक शब्द-कोषों से रची इन रचनाओं में.. पक्षीय गल्पो के साथ-साथ विपक्षीय गल्पो का भी अपना संसार है..। सत्कार है..तो तिरस्कार भी.. सब कुछ परम पावन उपकार ही है, साहित्यिक विधा में। अमृतलाल नागर की "प्रायश्चित" के कुछ शुरुआती अंश कुछ इस तरह-- " जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश-भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने खून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्ण-अक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलूपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।"

पुराने लेखकों में जहाँ भगवती चरण वर्मा की "मुगलों ने सल्तनत बख्स दी", भुवनेश्वर की "आज़ादी:एक पत्र" और गोविंद मिश्र  की "जीवन को पूरा नहीं पकड़ा जा सकता.." पढ़ने को मिला तो वहीं नये लेखकों के कलम से दूधनाथ सिंह की "किसी लेखक का जीवन सुखमय नहीं है", स्‍वयं प्रकाश की "कथाकार में पसीने की नहीं, आंसूओं की कमी है", आंनद हरषुल की "जीवन को छूना कम, विषय को छूना ज़्यादा हुआ है", कैलाश बनवासी की "आज कथा से गाँव गायब है" और वंदना राग की " आदिवासियों पर कम लिखा गया है"... रोचक लगी।

बस वागर्थ की रोचकता मेरे जीवन में बरकरार रहे...।