Tuesday, 20 January 2015

शिक्षक: क्रान्ति का अग्रदूत ...



आज के अख़बार में पढ़ा, किसी बच्चे ने पूछा की ब्राम्‍हांड की खोज किसने की ? जबाव था... हर वो बच्चा जो इस दुनिया में जीवन लेता है और अपने ज्ञान के सृजन से रचता और बसाता है| पर ज्ञान के सृजन का सूत्र कौन देता है... शिक्षक...!!! एक ऐसा ज्ञान केन्द्र जो खुद में सम्मानित है, अपनी ऊर्जा और अपने तेज से...| दुनिया नहीं बचती नहीं रचती नही बसती अगर शिक्षकों का आभार समाज और जगत को नहीं मिलता| दुनिया को छोड़ अगर मैं अपने भारत की बात करूँ तो राम लक्ष्मण के शिक्षक महर्षि विश्वामित्रा किसी को याद नहीं पर पोस्ट इनडिपेंडेन्स एरा में इस दिवस को सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में समर्पित किया जाता है| और फिर सामने एक सुंदर चित्र-मुखमंडल पे मल्यार्पण और कर्णप्रिया और दृश्याप्रिया कार्यक्रमों का आयोजन| क्या इतना काफ़ी है... एक नव-भारत की नव-रचना में...| शिक्षा से संबंधित वो सारे प्रयास बेकार हैं जब हम अपनी भारतीय सभ्यताओं में पुरातन तत्वों का आकर्षण ना पिरों सकें, और जब हम डेवेलपमेंट की नयी सीमाओं के सन्निकट हैं तो नये चर्म-रोगों का सामना भी तो साहस से करना होगा....याद रहे की यह रोग दिल और आत्मा तक ना पहुँच जाए| किसी ने कहा आप आज जहाँ हैं वो बिहार है... कुछ दिनों बाद आप का कर्मास्थल पूर्वांचल ना बन जाए... निवास स्थल सीमानचल ना बन जाए... और पैत्रीक स्थल अंगाचल ना बन जाए.... जब की आज से पहले १८५७ की तस्वीर कुछ ऐसी थी की... यह बंगाल था, फिर बिहार और ओड़ीसा बने ... अब तो झारखंड नये अस्तित्वा में आ चूका है| लेकिन फिर यह कोई नहीं कहता की यह एक दिव्यनचल है.... ब्राम्‍हंचल है... अध्यातमानचल है| यह बताने वाला एक शिक्षक ही है.... जो समग्र ज्ञान लिए खुद में पुरातन है, हर दिवस में चलयमान है.... आपके जीवन का सम्मान है| ये है तो एक सम्रिध राष्ट्र निर्माण है.... नहीं तो धृतराष्ट्र महान है|

~ विप्र प्रयाग घोष



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Monday, 19 January 2015

संजीवनी से जुड़ी खुशियाँ ही सही...!!!



कभी कभी समाचारों के माध्यम से ही सही, मिलने वाली यह खुशियाँ भी तो कुछ कम नहीं| हिन्दुस्तान दैनिक के इस आलेख में आज भी हमारे पौराणिक काल की संजीवनी बूटी के संरक्षण को बल देता संदेश हमें आज भी मिल पा रहा है, ये खुद में सुखद है की आज भी इसके विलुप्त अस्तित्व को जोड़ कर रखने वाले योग-पुरुष हमारे समाज में मुस्तैदी के साथ बने हुए हैं| संजीवनी बूटी और इससे जुड़ी बातों का ज़िक्र तो हम बचपन के दिनो में ही दादा दादी से सुनी रामायण की कहानियों में पौ फटते ही हर रोज़ कर लिया करते थे, और बचपन के पल हर रोज़ इस संजीवनी के संजीवन से उन्मुक्त हो खिल उठता था| ये बात उन दिनो की है जब मैं मैट्रिक बोर्ड दसवी की परीक्षा की तैयारी में जुटा हुआ था| हमारे बोर्ड के विषयों में हिन्दी के साथ संस्कृत की अपनी विशेषता थी| उस समय हमारे अंचल के प्रकांड संस्कृत शिक्षक और विद्वान हुआ करते थे श्री त्रिपाठी जी...| मेरी माँ भी अपने समय में उन्ही से संस्कृत और हिन्दी की शिक्षा ग्रहण की थी| हिन्दी और संस्कृत मेरी बहूत बुरी भी नहीं थी, लेकिन अगर आपने त्रिपाठी सर का आशीर्वाद नहीं लिया तो बहूत कुछ छूटा सा रह जाएगा| रिटाइयर्मेंट के बाद वो अपने घर पे ही संस्कृत की ट्यूसन पढ़ाते| अपनी मा के कहने पे मैने भी उनकी ट्यूसन क्लास जाय्न की| संस्कृत के साथ साथ कभी कभी हिन्दी पद भाग को भी पढ़ाते| याद है एक बार हिन्दी पद में जब वो तुलसीदास रचित राम चरित मानस के कुछ छंदों का ज़िक्र कर रहे थे, और सबरी के आश्रम की बातों का ज़िक्र आया, कि " कैसे उन्होने भगवान राम को बेर खिलाने के पहले उन बेरों को खुद चख लिया करती थी, ये पता लगाने की कहीं वो ज़्यादा खट्टे तो नहीं| राम तो उन चखे हुए बेरो को बड़े प्यार से खा लेते .. लेकिन लक्ष्मण उन्हें बिना खाए बगल में फेंक दिया करते... फिर जब आगे चल रावण के साथ युद्ध में मेघनाद का वान से लक्ष्मण मूर्छित हुए थे सबरी के आश्र्म में फेंके वही बेर संजीवनी बूटी बन लक्ष्मण की प्राण रखा में सहायक सिद्ध हुई थी, जो हनुमान जी ने हिमालय की पहाड़ियों से ही उस संजीवनी बूटी को पहाड़ सहित अपने हथेली पे रख लाए थे...|"
 इस अद्ध्याय के बाद मैं अपने घर आया.... पर मेरा मन कुछ बिंदूओं पे आके रुक सा गया था की... सबरी का आश्र्म तो कहीं भारत के दक्षिण में था फिर... हनुमान संजीवनी बूटी हिमालय की पहाड़ियों से लाए थे... लक्ष्मण ने बेर वहाँ फेंका था... फिर वो बेर दक्षिण से उत्तर के हिमालय पर्वत पे कैसे पहुँचा.. संजीवनी कैसे बना... और बहूत कुछ...!!! फिर अगले दिन अपने इन्ही प्रश्नो के साथ मैं त्रिपाठी सर के सामने था... और फिर पढ़ाने के बीच मैने अपने इन प्रश्नो को उनके सामने रखा... फिर क्या था.. मेरे उन तर्क-संगत प्रश्नो को सुन वो गुस्से में आग बबुला हो गये... मुझे सभों के बीच बेंच पे खड़ा कर दिया... और संस्कृत की गालियो से मुझे नहला सा दिया.... हराशंख, गार्दभ... और ना जाने क्या क्या...| उन्होने कहा जिसकी दादी इतनी धर्मात्मा, दादा इतना कर्मठ... उनका पोता इतना पाखंडी होगा.. इतना कह उन्होने मुझे अपने क्लास से निकाल दिया| मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था की मुझसे ग़लती क्या हो गयी... बस केवल वो संस्कृत की गालियाँ मेरे कानो में गूँज रही थी.. फिर कुछ दिनो बाद मैट्रिक की परीक्षा हुई, फिर रिज़ल्ट आए| सबसे ज़्यादा नंबर मुझे संस्कृत में ही मिले थे... मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था| फिर एक दिन मेरा एक मित्र मुझे बुलाने मेरे घर पे आया की त्रिपाठी सिर ने तुम्हें बुलाया है... इस बार उनके यहाँ पढ़ने वालों में तुमें ही सबसे ज़्यादा नंबर आयें हैं..| फिर मैं उनसे मिला, उनके पावं छुए... आशीर्वाद लिया... मानो मेरी संजीवनी मुझे मिल सी गयी थी| फिर वर्ष २००७ में विवाह उपरांत जब मैं महाराष्ट्र के महाबालेश्वर गया था तो वहाँ उन पर्वतों पे मेरी धर्म-पत्नी को संजीवनी के पत्ते मिले थे, मैं वहाँ भी संजीवनी की यादों में ठिठक पड़ा था... और फिर आज भी... |

विप्र प्रयाग घोष

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अध्यापन में पौराणिक अविष्कारों की विलुप्त संस्कृति... !!!


अभी अभी एक साइबर केफे में बैठ कुछ काम कर रहा था की तभी, बाहर से एक १४-१५ वर्षीय युवा की अपने मित्र से बात करने की आवाज़ कुछ यों आयी| " यार ये वेद क्या होता है... कहीं इसकी किताब इंग्लीश में मिलेगी....!!!" बस इन बातों से जान लीजिए की आज की युवा पीढ़ी, जब अपने देश की इंग्लीश मॉडेल शिक्षा से ओत-प्रोत है तो फिर भी इनकी अपने मिट्टी की पुरातन दिव्य-ज्ञान को जानने के उत्साह और ललक को भी नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता| ... और अगर समय के साथ हम अपने अध्यापन शोध से मोबाइल और मीडीया लोलुप बच्चों में पौराणिक अविष्कारों के सूत्रों के रहस्शयों का बीजा-रोपण ना करें तो... ये कह सकते हैं की बिना जड़-शक्ति संवर्धन के आप अपनी परिभाषा में जटिलताओं का आंकलन नहीं कर सकते|

 मैं खुद अपने विषय-वार अध्यापन अनुभवों को छात्रों के सामने जब भी उकेरने की कोशिश करता करता हूँ,तो जब तक उन टॉपिक्स के जन्म लेने के आलेखों का वर्णन नहीं करता हूँ... तब तक आज की डेवेलप्ड एप्रोच और उनकी विविधताओं को सामने रखने की आत्म-संतुष्टि नहीं मिल पाती| कंप्यूटर साइन्स इंजिनियरिंग की एक सब्जेक्ट है सिस्टम प्रोग्रामिंग... अन्य सारे सब्जेक्ट के मुक़ाबले कुछ जटिलताओं से समाहृत... तभी आज हम सूपर और क्वांटम कंप्यूटिंग के कमपाइलेसन और प्रोग्राम एक्सेक्यूशन को संभव होते देख पाते हैं| लेकिन जब इन टोपीक्सों को किताब की परिभाषा में पिरोना हो तो जॉन जे डोनोवान की किताब से रूबरू होना पड़ता है... जहाँ आपके सामने आइबीएम ३६०/३७० मसीनों का ही उल्लेख करना होता है... और फिर इन मसीनो पे किसी प्रोग्राम का कमपाइलेसन और एक्सेक्यूशन फेज़...|
http://en.wikipedia.org/wiki/John_J._Donovan
http://en.wikipedia.org/wiki/IBM_System/360
http://en.wikipedia.org/wiki/IBM_System/370

अब आज के समय विदेशों के कुछ नामी महाविद्यालयों को छोड़... इन मसीनो के सिम्युलेटर या फिर शोध व्याख्यानो से ही इनके वर्चुयल रूप को सामने रखा जा सकता है| तो जब भी इस सब्जेक्ट टॉपिक की व्याख्यान की बारी आती है तो मैं अपने जीवन की इस रोचक प्रसंग को कंप्यूटर साइन्स छात्रों के सामने रखने से खुद को नहीं रोक सकता|

 मेरे ठीक जन्म के बाद, ये बात एप्रिल १९७७ की है, तब मेरे चाचाजी जो उस वक़्त यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंग्टन अमेरिका में मास्टर ऑफ साइन्स- फोरेस्ट रिसोर्सस की पढ़ाई कर रहे थे... उन्होने अपने पत्राचार में अपने खुशी की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की थी... " मैं अपने कंप्यूटर लैब में था जब बाबा (पिताजी) का पत्र मिला... जान कर  खुशी से उछल पड़ा की दादा(बड़ेभाई) को बेटा हुआ है ,  अभी अभी यूनिवर्सिटी लैब के   कंप्यूटर पे अपने प्रोग्राम को SET कर आया हूँ, आधे घंटे में पूरा हो जाएगा... इस बीच थोड़ा वक़्त मिला तो आप सभो को पत्र लिख रहा हूँ... "

.... तो ये बात १९७७ की थी जब एक कंप्यूटर प्रोग्राम को कंपाइल और रिज़ल्ट देने में आधे घंटे का समय लगता और तब... जब वो प्रोग्राम सही हो तो... नहीं तो फिर थोड़ा मॉडिफिकेशन और रिज़ल्ट का घंटों इंतज़ार... जो आज के पेंटियम मसीनो में पलक झपकते हासिल हो जाता है|

आज जब हम अपने कोर्स मेटीरियल को आज के प्रोफेशनल डिमांड से को-रिलेट करने की कोशिश में जुटे हैं, तो इस बात का ख्याल रखना बिल्कुल ज़रूरी है की इन सब्जेक्ट के नये विज्ञान के साथ इनके उत्सर्जन के जड़-तत्वों को भी जोड़ कर रखा जाय तो फिर ही आज के हमारे छात्र इनके भविष्य-शोधों में भी दिलचस्पी दिखा सकते हैं... और इस मामले में मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की भारत में इन अध्यापन शोधों की भारी कमी सी है, और आज भी इस क्रम में चीन, जापान, कोरिया... जैसे देश हम से आगे हैं|

भारत के पिछड़े प्रांतों में नयी यूनिवर्सिटी खुल रही है, नये कोर्स सिलेबस बन रहे हैं जो आइ आइ टी के तर्ज़ पे ही बनाए जा रहे हैं... लेकिन क्या हम आज के नये सरकारी और प्राइवेट संस्थानो में पढ़ रहे छात्रों को अपने अध्यापन तंत्रों के ज़रिए उनके स्कूली समय से ही उस उत्साह को संवर्धित करवा पा रहे हैं| जब की आज भी उन प्राइवेट टेक्निकल संस्थानो में पढ़ने वाले ६०-७०% छात्र छोटे कस्बों और गावों से ही बड़ी सहजता से तो प्रवेश कर जाते हैं, लेकिन जड़ आधार गायब दिखता है| आप इंजिनियर डिग्री होल्डर तो बन जाते हैं, लेकिन जड़ तत्वों के ज्ञान के आभाव में... विषय-वार शोध और अपनी प्रोफेसनल गरिमा को स्वीकृत नहीं कर पाते|


~ विनायक रंजन

Friday, 9 January 2015

एलियंस की खूशफ़हमी से ज़्यादा...

भारतीय गणतंत्र दिवस 2013 के शुभ-अवसर पे दिए गये अपने संतोषप्रद भाषण के बाद.. ज्यों पलटा तो मेरी नज़रें ठंड में ठिठुरते बगल के गाँव के उन नन्हें बच्चों पे जा टिकी.. जो उस दिन हमारे इंजिनियरिंग कॉलेज में आए थे। वे बड़े ही कौतुहुल भाव से टक-टकी लगाए बस उस नज़ारे को देखे ही जा रहे थे। उनके लिए सब-कुछ विचित्र ही था। दिवस के महत्व से ज़्यादा शायद खुद के प्रत्यक्ष प्रमाणों में कुछ खोए हुए से..। कॉलेज में उस दिन के समारोह में हम सब उनके लिए विचित्र थे तो उनकी भावुकता मेरे लिए.. मानो मुझे एक अजीबोगरीब ग्रह की ओर खींचे चली जा रही है। फिर समारोह समापन के उपरांत सभो को गरमागरम जलेबीयाँ दी गई.. और वे बड़े ही वृहत-भाव में फूले नहीं समा रहे थे। उन सभो के संस्थान परिसर से जाने के बाद... जैसी मेरी व्याकुलता भी उन सभी बच्चों के संग हो चली थी। वो हमारे ही जैसे  भारत माता के ही बच्चे थे.. हमारी आने वाली कल की धरोहर..। मन ही मन मैं अपने संस्थान के चेयरमॅन को धन्यवाद दे रहा था.. की अच्छा हुआ जो उन्होने मुझे एक दिन पूर्व पटना जाने से रोक दिया.. नहीं तो मैं उस क्षण को दोबारा नहीं जी पाता। फिर दिन के भोजन के बाद मैं अपने कमरे में आया और थोड़े विश्राम के मन से पलंग पे लेट सा गया..। कुछ ही पलों में लगा जैसे वे बच्चे मुझे निमंत्रण दे गये हों। उनकी स्थिति देख मैं गहन चिंतन में डूब सा गया था। उस दिन की ठंडी में भी कम कपड़ों से ठिठुरते उनके उत्साहित भाव ने ही मुझे झकझोड़ सा दिया था। फिर तो जैसे एक नये सफ़र को निकलना ही था। झट मैने अपने बॅग से अपना कॅमरा निकाला.. अपने एक लेक्चरर कलिग को साथ लिया और पास के ही गाँव को निकल पड़ा। शुक्र था की वो लेक्चरर भी मेरा छात्र रहा था.. इसलिए बेमौके मेरे निर्देशों पे भी उसे ज़रा भी अचरज नहीं हुआ.. और हम उस दोपहर को कुछ लुभावने फोटोग्राफी करते हुए आगे चले जा रहे थे। रास्ते में मिले कुछ नील-गायों के दृश्यों को कॅमरे में समेटे आगे बढ़े ही थे की.. कुछ बच्चे गाँव के बगल वाली एक सपाट मैदान पे क्रिकेट खेलते नज़र आ गये।
हम जैसे जैसे उनकी ओर बढ़ते जा रहे थे.. उन सभो का ध्यान भी हमारी ओर ही आकृष्ट हुआ जा रहा था। फिर मैदान की बाउंड्री पे ही हम जा बैठे की कहीं हमें देख उनके खेल में कुछ खलल ना पड़ जाए। फिर मैं बाउंड्री से ही "कंट्री-साइड क्रिकेट थीम " की कुछ रोचक तस्वीरें अपने कॅमरे से निकालता रहा। धीरे-धीरे कुछ बच्चे भी हमारी ओर आने लगे.. ये छोटे नन्हे बच्चे वही थे.. जो आज हमारे कॉलेज को आए थे। वो हमें देख मुस्कुरा रहे थे.. एक बच्चे ने भोजपुरी में कहा.. " ई ता कॅलिज के पोफेसर लागा तानी"। और फिर पास आकर मुझे और मेरी फोटोग्राफी को देखने लगे। मैं भी उन्हें अपनी ली गयी कुछ फोटोस को उस डिजिटल कॅमरे से दिखाने लगा। फिर तो धीरे-धीरे अच्छी ख़ासी भीड़ सी जमा हो गयी हमारे आस-पास। ढलती शाम और मॅच की समाप्ति के बाद सारे मैदान के लड़के हमारे आस-पास ही थे। बहूत दिनो बाद उस विश्मय भावुकता का एक विह्वल कर देने सा दृश्य उभरकर मेरे सामने था। उनके और हम-सभो के भिन्न कद-काठीयों में बस एक समानता थी.. वो था एक प्यारा सा मन.. जो उस जीवन को भी साकार था। उन सभो के हंसते हुए चेहरों से निकलते भावों की रूप-रेखा अन्यतम सी थी। फिर मैने सभो से पूछा- " आप लोगो को पता है.. की आप जिस प्रदेश में रहते हो वो क्यों प्रसिद्ध है ?" उनके भाव शून्य से थे। फिर एक लड़के ने कहा -" हाँ, बक्सर का युद्ध हुआ था यहाँ..।" फिर मैने कहा-" भगवान राम-लक्ष्मण को जानते हो..? रामायण की कहानियाँ पढ़ी है। ये वही जगह जगह है जहाँ राम-लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में पढ़ाई करते थे.. और ये सदियों से बड़ा ही अलौकिक प्रदेश रहा है। "... इतना कहते  ही मैने सभो में एक दिव्य-अंकुरण को देखा। फिर उनके पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी बातों का कुछ ज़िक्र किया। इतने में एक लड़के ने पूछा.. "ई कॉलेज में ITI के पढ़ाई होता है क्या? हमरा दुगो चाचा यही पढ़ाई कर के दुबई में नौकरी कर र्रहे हैं।" ...और बात भी सही है.. इस भू-भाग के सैंकड़ों लोग अर्थाभाव में  ITI जैसी प्राथमिक  तकनीकी शिक्षा को हासिल कर बहूत कम उम्र में मोटी रकम कमाई के लिए खाड़ी देशों का रुख़ कर लेते हैं..और स्नातक स्तर की वैचारिकता और शिक्षण का बोध नहीं कर पाते। फिर मैने उन्हें इंजिनियरिंग के विषय और महत्व के बारे में बताया। इतने में देखा गाँव के कुछ युवक हाथों में मोबाइल लिए.. भोजपुरी गानो की धुन के साथ हमारी ओर घूरते चले आ रहे हैं। इतने में वहाँ जमा बच्चे उनके मोबाइल की धुन की ओर चल परे... और फिर मैं भी वहाँ से अपने कॉलेज की ओर निकल पड़ा।

शायद वो पहला मौका थे जब हम कॉलेज से अगल-बगल की हरी वादियों में पहली बार निकले थे। उस बार याद है.. मकर-संक्रांति के बाद मैं दो-तीन हफ्ते बाद ही पटना को आया था। ..लेकिन गाँव के बच्चों के साथ बिताए कुछ पलों ने मुझे बाहर की प्रकृति के साथ खोल कर रख दिया था। मानसिक क्लेश को कुछ कम होता भी देख पा रहा था.. और हो भी क्यों ना.. जब जीवन में आपकी अभिव्यक्ति को कम ही मौके मिलते हों.. उसके अंतरिम दर्पण में समाने को। फिर हम उस दिन की तरह हर रोज़ कॉलेज के चारो ओर किसी न किसी दिशा में निकल पड़ते.. और खोज लाते जीवन की उस समृद्ध संजीवनी को जो आज भी हमारे जैविक-विन्यास को सहेजे हुएँ हैं। उसी दौरान एक दिन शाम के वक़्त कानो में भक्ति-रस में गूंजते कुछ बोल सुनने को मिले। कॉलेज के चारो ओर छायी हरियाली से वो आवाज़ कुछ रिस-रिस का कानो में समा जाती.. और मैं खुद में मग्न हो जाता। फिर पता चला दूर गाँव में एक नये मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा स्थापन कार्य चल रहा है। ये सुनने के बाद मैं मन ही मन वहाँ जाने को आतुर हो उठा था। जैसे उस दृश्य-वींणा में मुझे खो जाना सा था। लेकिन सुबह होते ही कॉलेज की दिन-चर्या में मन थोड़ा बँट सा जाता और फिर शाम होते होते वो भाव भी थोड़े मद्धिम से हो जाते। मैं अंदर ही अंदर रुक सा गया था। फिर एक दिन अगली सुबह...

करीब सुबह के साढ़े तीन बज रहे होंगे.. मगर चारो ओर छायी घने कोहरे के अंधेरे में वो रात ही थी। पल भर के लिए नींद टूटी ही होगी की वो  मंदिर से आती ढोल मंज़ीरों की आवाज़ कानो में समा सी गयी। आँखें बंद किए उस ठंडी रात में फिर से सो जाने की कोशिश की.. पर सो ना पाया। शायद उस ओर जाने की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी.. लेकिन उस रात के अंधेरे में वहाँ जा पाना भी दूभर ही था। फिर करीब चार बजे मैने कॉलेज के लाइब्रेरियन श्री पाठक जी को फोन लगा अपनी इच्छा बताई और उन्हें साथ चलने को राज़ी कर लिया। आधे घंटे बाद हम उस आती आवाज़ के सीध में थे... सीध इतना की मेन रोड होते हुए भी हम उस कोहरे भरी रात में सन्नाटे को चीरते हुए खेते-खेत एक शॉर्ट-कट रास्ते पे थे। गर्म कपड़ों के साथ माथे में वूलेन टोपी, वर्षों पहले मेरे दादाजी की दी हुई लाल-ईमली चादर लपेटे और एक हाथ में चाइनीस टॉर्च और पुलिसिया हंटर लिए मैं उस सफ़र में अति-उन्मादित था। उस वीरान खेतो, बगीचो और छोटे जंगलों को पारकर हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते ही जा रहे थे की... दूर से आग की लपते उठती नज़र आई.. पास आया तो देखा उस घने अंधेरे में कोहरे की चादर ओढ़े..   कुछ लोग बगीचे के बगल आग ताप रहे हैं। वो पहरा दे रहे थे.. अपने फसलों की..। पास आने पे उन्होने टॉर्च दिखाया और हमें रास्ता भी..। मगर वे आख़िर किस नव-ग्रह की  रक्षा में लगे थे.. पूरी रात उस वियावान जंगलों और खेतों के बीच..। और मैं भी अपने अनुभवों को टॉर्च दिखाता उन मेडों पे सजगता के साथ आगे बढ़ रहा था। आख़िर २० मिनिट पैदल चलने के बाद हम गाँव में प्रवेश कर ही गये.. आगे बढ़ने पे गाँव की कुछ महिलाओं व बच्चों को उस पगडंडी के दोनो ओर बैठा पाया। पाठक जी के निर्देश पे मैं अपनी सीध में नाक दबाए चला जा रहा था और दोनो ओर बैठी महिलायें अपनी नज़र बचाती जा रहीं थी। फिर गाँव के मध्य आके हम थोड़े पासचिं की ओर मंदिर की ओर चलने लगे। गाँव की कुछ महिलाओं को अपने परिवार के साथ माथे पे कलश लेकर भक्ति-भाव में डूब लोक-गीतों के साथ उसी रास्ते मंदिर की ओर जाते देखा और फिर हम उनका अनुसरण करने लगे..।

पौ फटते ही उषा-काल में हम उस नव-निर्मित मंदिर के सम्मुख थे। फिर थोड़ी देर मंदिर के परिसर को भ्रमण कर हम दुबारा गाँव की ओर ही रुख़ कर लिए। गाँव का नाम अरियांव था। मंदिर आते वक़्त ही मैने ये निश्चित कर लिया था की थोड़ी देर ही सही कुछ पल इस गाँव में ज़रूर बिताऊँगा। गाँव के पुराने मकानो में भी तो एक भव्य स्थापत्य नज़र आता है.. और वास्तव में इसी स्थापत्य ने ही भारत की भीतरी नीव को बचाए रखा भी है। पाठक जी के जान-पहचान वाले कुछ लोगो से मिलकर हम उस गाँव की एक लाइब्ररी जा पहुँचे। इस लाइब्ररी का नाम भी "विद्या-दान" ही था, जिसकी स्थापना वर्षों पहले मेरे कॉलेज के चेयरमॅन ने की थी। हमें आदर-पूर्वक बिठाया गया.. सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ उस लाइब्ररी के संग्रह को देख मैं विस्मित था। अध्यात्म और इतिहास के किताबों के साथ बांग्ला, हिन्दी और रसीयन साहित्य की किताबों को देख मैं अचरज में था.. और ख़ास कर इसलिए भी की वो मुझे उस गाँव में मिली थी। इन किताबो की मौजूदगी ही उस गाँव की प्राचीन भव्यता के पुख़्ता सबूत थे.. और वहीं मुझे पहली बार परमहंस योगानंद की "ऑटोबाइयोग्रफी ऑफ योगी " मिली थी। फिर उस गाँव से निकलते समय दिखे सुंदर नाक्काशी की हुई तीन-मजिली लकड़ी का घर..। कुछ पलों के लिए लगा इस स्थापत्य में कश्मीर के भाव दिख रहे हों..। लेकिन उचित रख-रखाव के कारण वो भी दम तोड़ रही थी। लौटते वक़्त बस मैं यही सोच रहा था की अगर मैं इस ओर रुख़ नहीं करता तो शायद इस नवग्रह की आभाओं से कोसों दूर ही रहता..।

 अभी अभी फिल्म "पीके" देखने को मिली। किसी नये ग्रह से आए एक एलीयन को भारतीय सरजमीन पे एक शोध-स्वरूप के रूप में। फिल्म ने कारोबार भी बहूत किया।उत्कृष्ट अभिनय और संवाद अदायगी भी कुशल निर्देशन के साथ बेहतरीन थी। मनोरंजन जी भर कर मिला। लेकिन क्या भारतीय उम्मीदों का बस ऐसे मनोरंजक फिल्मों से ही मरहम होता रहेगा। आप एक पात्र के माध्यम से दो देशों की भावनाओ को जोड़ने का तो प्रयत्न बड़ी मुस्तैदी से करते नज़र आते हैं लेकिन देश की छाती कहे जाने वाले प्रदेशों के खोखलेपन की पीड़ा को नहीं देख पाते। भोजपुर जैसे कितने ही प्राचीन भू-भागों में आज भी लोग बस मनोरंजन की पट्टी लगाते ही नज़र आते हैं। ज़रूरत है.. आपकी संवेदन श्रोतों का.. जो एक एलीयन बनके ही सही.. ज़मीनी हक़ीकतों से रूबरू तो हों।

Vinayak Ranjan



Tuesday, 4 November 2014

गुरुत्वाकर्षण में ब्रम्‍ह का दिख जाना...

   कुछ दिनो पहले की ही बात है.. समाचार पत्र के माध्यम से जान पड़ा की हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार श्री गोविंद मिश्र जी को उनकी कृति " धूल पौधों पे" के लिए के. के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा "सरस्वती सम्मान २०१४" से नवाजा गया है। करीब २० वर्षों के एक लंंबे अंतराल के बाद ये सम्मान पाने वाले.. वे प्रख्यात हरिवंश राय बच्चन के बाद दूसरे शख़्श् हैं। इस समाचार को पढ़ने के बाद ही.. एक पल के लिए मुझे लगा..  मानो मैं उनके निकट ही हूँ। सहसा सेल्फ़ पे रखे "वागर्थ" मासिक पत्रिकाओं के पुराने अंकों को टटोलने लगा। फिर एक अंक में प्रकाशित उनकी रचना "जीवन को पूरा नही पकड़ा जा सकता.." दिखाई दी। इसे मैंं कुछ माह पूर्व ही पढा था। मन ही मन आनंदित हो उठा.. ये जान कर की मेरा आभास तो सही ही था.. वो मेरे निकट ही थे। फिर देखा उनके नाम व उनकी लिस्टेड कृतियों के साथ उनका वर्तमान पता और मोबाइल नंबर भी नीचे अंकित है। फिर क्या था.. मैं तो अब उनके काफ़ी निकट ही था..।

एक लंबी साँस लेने के बाद मैने उस दिए मोबाइल नंबर पे फोन किया.. और फिर चार-पाँच रिंगो के बाद ही वृद्धावस्था की एक मीठी सी आवाज़ कानो में समा सी गयी। मैने उन्हें सर्व-प्रथम सरस्वती सम्मान के लिए बधाई दी और फिर अपना परिचय भी दिया.. वे गोविंद मिश्र ही थे। फिर हमारी बात- चित करीब १०-१२ मिनिट की रही होगी.. और फोन रखते ही एक अजीब सी शांति-छाया से खुद को घिरा देखा। जैसे लगा बातों-बातों में मेरे मंन की बातों की पुष्टि होती चली गयी.. और फिर लगा जैसे हम सब एक-दूसरे के कितने करीब पिरोए हुए हैं.. और हमें पता भी नहीं चलता। ये ब्रम्ह-दर्शन नहीं तो और क्या है!! हम जिस दृश्य-वीणा की गूँज को जग से सुनना चाहते हैं.. वो तो हमारे पास ही है। फिर तो मुझे इसी गुरुत्व में बैठना है.. और फिर हम जन्मोपरांत जिस भी गुरुत्व केंद्र की कक्षा में गये थोड़े उसी के अधीन हो गये.. ब्रम्‍ह की चाह में थोड़े ब्रम्हर्थि तो थोड़े ब्रम्‍हास्त्र हो गये। "सर्व-धर्म सम्भाव" वृहत आवरण के भीतरी चरम पे "सर्व-मान्य सम्भाव" के ब्रम्‍ह से भी तो स्वंय ही सिद्धि लेनी होती है।

साहित्य से थोड़ी बहूत अभिरुचि तो सभो को बचपन से ही रहती है.. चाहे हमारी भाषाएँ जो भी हो.. हम चाहे किसी भी धर्म या भौगोलिक भू-भागों से आतें हों। फिर या तो जीवन की अनेकानेक राहों में हम निकल भी पड़े हो.. लेकिन किसी भी विधा में हमसब अपने-अपने साहित्य की वृष्टि-छाया में खुद को भिंगोते ही रहते हैं.. चाहे वो हमारा आंशिक प्रतिरूप ही क्यों ना हो। ३१ अक्टोबर २०१४ को एक और खबर आई.. मश्हुर लेखक "रॉबिन शॉ पुष्प" के निधन को लेकर। मैं इस नाम से पहली बार मुखातिब हो रहा था। लेकिन जब हिन्दुस्तान दैनिक के स्मृति-शेष पन्ने में उनकी साहित्यिक जीवन-यात्रा से अभिभूत हुआ तो लगा मानो...  "ब्रम्‍ह-विस्तार" का रूप अदृश्य ही होता है क्या..? मेरे जैसे कितने ही पाठक होंगे जिन्होने शायद इस नाम को पहली बार सुना और देखा हो। लेकिन इन साहित्यकारों के नाम उस नभ-सभा में नहीं छाते जिस तरह अन्य सभाओं में छा जाने की एक होड़ सी मची है.. चाहे वो हमारी गरिमामय संसद की लोक या राज्य-सभा जैसी सभायें ही क्यों ना हो। काश कि इन साहित्यकारो व कलाकारों से सजी एक "कला-साहित्य सभा" ही बन पाती। उँचे कदो के बैनरों में आज के हमारे इन साहित्य सभा-सदों का भी चित्र उकेरा हुआ होता। कुछ प्रेरण शक्ति में इज़ाफा होता.. वैचारिक बेरोज़गारी घटती.. कुछ बोझ घटता.. कुछ आपका.. कुछ हमारा। 
http://www.khaskhabar.com/picture-news/news-prominant-writer-robin-shaw-pushp-no-more-1-27545.html

रॉबिन शॉ पुष्प के निधन पे फादर कामिल बुलके की एक प्रतिक्रिया जो पढ़ने को मिली.. " रॉबिन शॉ उन गिने-चुने ईसाइयों में हैं, जिन्होने हिन्दी साहित्य के संसार में भरपूर नाम कमाया। नि:संदेह श्री पुष्प आज हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कलाकार हैं- नुकीले अनुभव, खंडों के कुशल शब्द-शिल्पी, संवेदनाओं की जटिल ग्रंथियों के अनूठे कथाकार।"


क्या कभी संवेदनाओं के चरम को गुरुत्वाकर्षण के दो-धुरियों पे चलते देखा है..? आज भी वह स्मरण सहसा ही याद दिला जाती है.. उस सफ़र की..। बात कुछ दिनो पहले की ही है.. मगर उसकी सरज़मीनी जुड़ी रुदन वर्षों पुरानी..। हमेशा की तरह बक्सर के इंजिनियरिंग कॉलेज से शाम को लौटते वक़्त टूडीगंज स्टेशन पे अपने व्याख्याता मंडली के साथ बक्सर से पटना की ओर जाने वाली ट्रेन का इंतेज़ार कर रहा था। ठंड के दिनो में शाम भी जल्द ही हो जाती है। शाम के करीब साढ़े पांच बजे होंगे.. लाउड स्पीकर पे आवाज़ आई की ट्रेन डुमराव स्टेशन पे आ गयी है। फिर कुछ देर के बाद ट्रेन आई। मगर ये क्या..??  ट्रेन पूरी की पूरी खचाखच भरी हुई। ट्रेन के अंदर जाने की बात तो दूर.. दरवाजे पे भी पांंव रखना मुश्किल था। एक ख्याल आया की इस ट्रेन को छोड़ दूँ.. लेकिन फिर दूसरी ट्रेन तीन घंटे बाद ही थी। ये सोच मैं तेज़ी से प्लेट-फॉर्म पे आगे की ओर बढ़ने लगा.. की कहीं कोई गुंजाइश बने ट्रेन पेे चढ़ने की..। ताज्जुब हो रहा था.. की पिछले दो साल के अनुभव में इतनी भीड़ मैने पॅसेंजर ट्रेन में कभी नहीं देखी थी..। तभी आगे की एक बॉगी से एक वृद्ध महिला को ब्मुश्किल उतरते देखा.. फिर तेज़ी से आगे बढ़ उनकी लाठी को हाथों में लिया और अपने बाजू का सहारा दे.. उन्हें उतरने में थोड़ी मदद की..। उनके ठीक पीछे एक महिला भी उस खचाखच भरे ट्रेन से उतरने की जद्दोजहद में लगी हुई..। गोद में एक बिलखता बच्चा और साथ एक छोटी सी बच्ची भी। शायद वो उस वृद्ध महिला की रिश्ते में थी। मैने फिर उस छोटे से बच्चे को गोद में लिया और उन्हें भी उतरने में थोडी मदद दे पाया। ट्रेन भी अब प्लेट-फॉर्म छोड़ चूकी थी.. मैने थोडी हिम्मत दिखाई और झटके से गेट के हॅंडल को पकड़ अंदर की ओर जाने की कोशिश की.. की तभी मेरे एक लेक्चरर मित्र ने भी पीछे से जोड़ का दबाव बनाया.. और हम दोनो चलती ट्रेन में खुद को सुरक्षित पाए।

अंदर की भीड़ इतनी की जो जहाँ थे.. वहीं खड़े रह थे। मगर ये क्या..?? इक्का दुक्का पुरुषों को छोड़ महिलाओं और बच्चों की संख्या ही ज़्यादा थी। ग्रामीण पृष्ठभूमि के इस सफ़र में.. भोजपुरी लोक-गीतों से सज़ा ये कैसा भाव्य था..। मैं सबकुछ बड़े ही अचरज से बस देखे जा रहा था। बीच-बीच में छोटे स्टेशन और हॉल्ट पे उतरने चढ़ने के क्रम में महिलाओं की तू-तू मैं मैं भी.. "मछली बाज़ार" के दृश्य जैसा ही कुछ दिखा जा रही थी। उम्रदराज महिलाओं का एक बड़ा तबका जिन्हें जगह नहीं मिली.. वो ट्रेन के फर्श पे ही बैठ कर अपने रस-मंजूषा में लीन थी। कुछ वृद्ध महिलायें तो थकान के कारण वहाँ चलती ट्रेन के फर्श पे लेटने से भी गुरेज़ नहीं कर रही थी। घुरमुराए बालों, मटमैले कपड़ों और अलसाए मन को लिए ये किस उन्माद को लिए लौट रही हैं? दिव्य-शक्तियों को समेटे पूरा का पूरा दृश्य दुर्गा-काली शक्ति-वाहिनी के विहंगम स्वरूप से से कम ना था..। मेरे मन में भी सकारात्मकता के साथ कई प्रश्नो का प्रज्वलन अपने चरम पे तो था ही.. लेकिन जैसे मेरे इस अनुभव ने ना जाने कितने ही जवाबों के स्वरूप को भी अंजाने में देख लिया हो। लेकिन फिर भी मुझसे रहा नही गया.. और मैंने थोड़ी हिम्मत दिखाई और पास खड़ी एक महिला से पूछ ही बैठा.... की आप सब कहाँ से लौट रहीं हैं? फिर जो जवाब मिला वो वाकई हैरान कर देने वाला था.. इसलिए नही की उस कृत में धर्म और अध्यात्म का सार था.. बल्कि इसलिए की इतने कष्ट को उठा ये किस सिद्ध-सृजन में तल्लिंन हैं। " बेटा, लिट्टी-चोखा मेला खातिर गेल रही..।" इतना कह वो मुस्कुराने लगी थी.. और मैं अचरज में था। आख़िर इतनी विषम परिस्थितियों में भी ये कैसा गुरुत्व का आकर्षण था। वृद्ध-अधेड़ महिलाओं और बच्चों को छोड़ कोई भी नहीं था साथ उनके इस सफ़र में.. फिर उस भीड़ से निकला एक लोक-गीत जो अब तक मेरे कानों में गूँज रहा है..

"बेटा ना पूछे.. बाबू ना पूछे.. ना पूछे पिरितया हमार हो.."। ब्रम्‍हांड की इतनी पुरातन सभ्यता का ये कैसा रुदन था? आज भी इन अभिसप्त रुदालियो का कैसा क्रंदन है.. जिनके मर्म की स्पष्टताओं को भेदने वाला कूदाली शायद ही चल सके.. फिर राम की मैली गंगा.. मैली ही सही..।

इसी तरह के एक सफ़र में.. ट्रेन में एक रोज़ बक्सर ग्रामीण अंचल के  एक जुझारू व्यक्तित्व का भी साक्षात्कार मिला। बातों बातों में ही मेरी कुछ बातें उन्हें भी रोचक लगी.. और उन्होने मुझसे हिंदी कंप्यूटर टाइपिंग से रिलेटेड कुछ मदद भी माँगी। बक्सर स्टेशन पे उन्होने खादी के थैले से निकाल अपने भूभागीय डेवलपमेंट व सौन्दर्यीकरण से संबंधित अनेकानेक लेखों का जखीरा मुझे दिखाया। सब के सब.. कुछ यूँ कहें उस धरती की आवाज़ ही थी.. और बीते वर्षो के मेरे लेखों में भी ये बहुत कुछ परिलक्षित हो ही जाता है। वो वर्षों से अपनी इस आवाज़ को दिल्ली बैठे आला-कमान तक पहुँचाते रहे हैं.. और हस्र ये कि..  दिल्ली दूर जाते-जाते.. यहाँ के गुरुत्व स्वर ही गुम हो जाते हैं.. तो रुदन तो सुनने को मिलेगा ही.. एक ब्रम्‍ह के विज्ञान से कुछ कम तो नहीं..।


Vinayak Ranjan

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Sunday, 28 September 2014

" बीते कल को भी थोड़ी... श्रधांजलि... !!! "

जब मानव अपने जीवन के संघर्ष को लिए सफलता के शिखर को छूने का प्रयत्न करता है, तो हमेशा उसकी आत्मशक्ति ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का काम करती है... और वह सहसा अपने सफ़र की ओर बढ़ता चला जाता है| सफ़र.. बिल्कुल ही अंजाना सफ़र... जिसने ना जाने कितने दिन और रातों को देखा | दिन में वो जितनी जीवटता से एक नये आयामो के उत्सर्जन को तलाशता, तो रातें उन भावों को अपने आगोश में समेत सी लेती.. की कल फिर तुम्हें एक नये संकल्प लिए आगे की ओर बढ़ना है | फिर इन स्पस्ट संकल्प-साधनाओं का खुद में अवतरित होना भी तो एक चमत्कार ही है.. जब वो सभो के हितो को भी नज़रअंदाज़ ना करे| इन्ही संकल्प-साधनाओं ने अशोक और अजातशत्रु को सम्राट भी बनवाया था, लेकिन वहाँ भी तो साभों के हित कुचले गये थे, और फिर बुद्ध शरण को जाना पड़ा था और त्याग को ही अपनाना पड़ा था| आज भी इन भावों में बचपन में सिखाए गये मूल मंत्रों की ही ख़ूसबू आती है, जब दादी बड़े प्यार से कहती की तुम बड़े हो ना, तुम्हें तो त्याग करना ही होगा और यही सुख का साधन भी| बचपन में सिखाए गये रामायण और महाभारत के तत्वों में भी तो त्याग और संघर्ष की ही गाथा रचाई और बसाई गयी| और फिर जिन्होने ने इन मंत्रों को पिया और जीया... सच्चे पात्र तो वो ही बने और वो हो समरसता के वाहक भी बने | आज भी हमारे भारत के सभी समुदायों में ऐसे कितने उदाहरण मिलते हैं... जहाँ अपनी निजी सफलता को छोड़ लोगों ने अपने गावों कस्बों में जाकर विकाश के नये विकल्पों के मार्ग बने| जब आप अपनी प्रतिभा से न्यू-यॉर्क में और आपके प्रिय-मित्र मंडली कस्बे की चौक में हो तो अंतर के इस दंश का विष भी आपको ही कम करना होता है, और ये भी खुद में एक विशेष प्रतिभा का परिलक्षण ही तो है, जिसे हम आज के वैज्ञानिक  भाषा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स कह लें | ईश्वर को धन्यवाद की आज हम ग्लोब-लाइज़ेशन की कसौटी में जी रहें हैं, नहीं तो इन सामंती मारकों का विष और भी ज़्यादा तीक्ष्ण होता| इसमें अतिशयोक्ति का भाव कतई नहीं, की इन्ही भावों के कारण आज भी जिस विकाश के रफ़्तार से हम आगे बढ़ रहें है, हमारा सामना भी इन वादों से कुछ ज़्यादा ही हो रहा है, मानो आज भी सुर-असुर अमृत मंथन में लिप्त हों| और इस कड़ी में हम इस भाव मंथन साहित्य के सारथि बने रहें और अपने बीते कल को भी थोड़ी श्रधांजलि अर्पित करते रहें... !!!

विप्र प्रयाग घोष


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Tuesday, 23 September 2014

" दुर्गाशक्ति, दशहरा, दशानन... इति विश्‍वरूपम...!!! "

मौसम ने फिर दश्तक दे दी है| नयी शक्ति लिए माँ जग को जगा रही है| हम अंधेरे में ही जागने की कोशिश कर रहे है| पौ फटने के पहले फूलों को बटोर रहे हैं, की माँ के चरणो में इसे अर्पित तो करूँ, जीवन के भ्रम को थोड़ा तो दूर करूँ...| ऐसा ही है माँ दुर्गा की शक्ति और दुर्गा पूजा का पावन पर्व| हम सभो के लिए कुछ खाश| साल भर के जोश को मानो यहाँ पुनर्जन्म मिल जाती हो| फिर आज भी साथ अगर अपना बचपना हो तो फिर कहना ही क्या...!!! बचपन के रोमांच को फिर हम दोबारा तो जी नहीं सकते, लेकिन समय समय इसे उकेर तो सकते ही हैं| दुर्गा पूजा की हलचल तो महीने पहले से ही दिख जाती है|जो घर पे हैं तो घर के साफ सफाई का ख्याल, जो घर से दूर हैं उनके अपने घर जाने की हौसला आफजाई का ख्याल भी तो बराबर रखना पड़ता है| माँ दुर्गा की शक्ति है ही ऐसी, आप खुद में रह ही नहीं पाते| आज भी महालया के आते ही याद आता है, पिताजी का रेडियो को ठीक सुबह ४ बजे ही महालया पाठ के लिए ऑन कर देना|


फिर तरह तरह के फूल जिनमें हर-शृंगार, अर्हूल और भी ना जाने कितने फूलों को तोड़ पौ फटते ही दोस्तों के साथ घर को वापस आना| फिर दोस्तों के साथ मधुबनी पूर्णियाँ के ठाकुर बारी में बन रहे माँ दुर्गा की प्रतिमा को देखने जाना| सुबह सुबह ही माँ का पूजा घर को सजाना, पुरोहित जी का दुर्गा पाठ के लिए आना, फिर सामूहिक पुष्पांजलि के साथ शंख और घंटों को बजाना... वास्तव में यही तो है दुर्गा शक्ति का आहवान करना और इनके समीप जाना| फिर ज्यों ही सप्तमी, अष्टमी, नवमी के जागरण को हम देखते हैं, दुर्गा शक्ति स्वरूप दशहरा उत्सव में परिणत हो उठती है| फिर नये नये वस्त्रों में मेले की ओर निकलना| पूजा पंडालों में माँ दुर्गा के विहंगम स्वरूपों का योग होना, वहाँ मिले प्रसादो का भोग, फिर मेले में कुछ खरीद-दारी कर घर को वापस आते हैं| खिलौने, मिठाई और तरह तरह के व्यापार भी होते हैं|  देखते ही देखते ये उत्सव एक महोत्सव का रूप ले लेती है|



फिर इस महोत्सव में सभी संप्रदायों के लोग एक साथ... क्या बूढ़े क्या जवान और क्या बच्चे... अपने नये स्वरूप.. विश्वरूप को धारण कर दशानन " रावण" वध के द्वंश का भी तो आनंद लेते हैं| बुराई पे अच्छाई की जीत का भास कर अपने अपने घर को लौटते हैं.... और फिर उस महोत्सव के विश्वरूपम की छाया को लेकर ही अपने विश्व-कर्म की ओर निकल पड़ते हैं...

|| इति दशहरा... इति विश्व-रूपम...||

विप्र प्रयाग