Thursday, 13 September 2018

जीवन स्तंभों की परछाईयाँ..

जीवन स्तंभों की परछाईयाँ..
..आँखों से होकर गुजरते और मस्तिष्क में समाते तरंगों को वापस अपनी खुशियों से लौटते देखो ..वो वापस 👥👥मिल से गए थे ..सबकुछ वैसा ही ..औऱ फिर एकांत में विलीन हो जाना ..सिर्फ एक प्रतिबिंब👤 लिए। ..वे ओझल होकर ..आज भी कैद है ..वे सारे भाव जो फिर दिखने से लगते हैं। मैं भी अक्सर इन पुराने स्तंभों🏤 को देखने पीछे का रुख कर ही लेता हूँ.. बस टकटकी लगाऐ निहारता चला जाता हूँ.. बिल्कुल मौन🗿। वर्षों पहले गाँव के मकान को संभालते ये मौन प्रहरी.. संदूक से निकाल कितने कौरियों को बिखेर देता था मैं.. इन्हीं फर्शों के उपर..। वो सबकुछ तो आज भी कैद सी हैं.. जिती जागती सी तस्वीर। सबकुछ यहाँ अपना सा है आज भी.. फिर से वे टकराकर लौटने भी तो लगे हैं ..और एक बार फिर मैं एकांत में विलीन🗿

मेरी आवाज को दर्द के साज को तु सूने ना सूने..

मेरी आवाज को दर्द के साज को तु सूने ना सूने..

 ...पूरा शरीर तेज आग सा तप रहा था ..बिस्तर पे पङे-पङे अब तो तीन दिन से ज्यादा हो गए थे। घर से इतनी दुर परदेश में आखिर कौन सुध ले हमारी..। वो एक दीदी है.. जिनके घर से खाने की टिफिन आती है.. कहने पे.. थर्मस भर के.. गर्म हॉर्लिक्स और ब्रेड भी सुबह शाम आ जाती है.. और दिन में खिचङी भी..। फिर ये सब क्या है.. इतने सारे सिगरेट के जले बड्स कहाँ से आए..। लाख छुपाने पे भी निकल ही आते है.. ये मुँहलगे.. हाल पुछने। रविशंकर भी तो कह गया.. कॉलेज नहीं आते हो तो मन ही नहीं लगता है दोस्त... और उनका ये माफीनामा छोङे गया..। अच्छा हुआ.. जो मुकेश के ये दर्द भरे नगमें साथ थे.. आवाज को जिंदा किए.. कुछ युँ रिझाते.. "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा..." इन्हीं बहुमूल्य आभारों के साथ मेरे पसंदीदा व स्वर गायक मुकेश के जन्म-दिवस पे भाव-भीनी श्रद्धांजलि..।

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पूर्णियाँ भट्टा बाजार का मछली बाजार और मामा जी प्यार..


 पूर्णियाँ भट्टा बाजार का मछली बाजार और मामा जी प्यार..

   आज बङे दिनों बाद भट्टा बाजार की ओर निकल पङा..। रविवार देख तो यहाँ के मछली बाजार का जोश देखते ही बनता है.. तरह-तरह की मछलियाँ.. रोहू, कतला, सिंही, मांगुर के साथ सौङा.. कबय भी.. और भी अनगिनत नामों की मछलियाँ। मछली लेकर बाजार से ज्यों निकला.. साहित्य-कोष का तेज समा सा गया। ..अपने मनोभावों को टटोल अपने साहित्य व कलाप्रेमी मामाजी से मिलने उनके आवास पे जा पहुंचा। इस क्रम में ठीक उनके आवास से पहले जो मार्ग आया.. सतीनाथ भादुङी लेन.. उसकी लेख-पट्टिका को देख मन थोङा रुक सा गया..। मानों एक विस्तृत साहित्य-संदर्भ.. अपनी चिरंत दशाओं में थोङा भटका हुआ। सतीनाथ भादुङी की पहचान बांग्ला साहित्य में किसी की मोहताज तो नहीं.. लेकिन इन उत्कृष्ट जङ-स्तंभों को आज भी सहेजने की जरुरत है। 

...ये मुखर व स्पष्ट है कि फनिश्वरनाथ रेणु के भी आदर्श प्रणेता सतीनाथ भादुङी ही थे। भारतीय आजादी के समय इनकी सुप्रसिद्ध कृतियों "जागरी" व "ढोराय चरित-मानस" ने ही तत्कालीन मनोदशाओं में व्याप्त भ्रष्ट-प्रवृत्तियों के खिलाफ व पिछङे-शोषितों के संरक्षण का सशक्त चित्रण साहित्य के माध्यम से किया था। "जागरी" का अन्य भाषाओं में रुपांतरण कर जहाँ युनेस्को जैसी सर्वोच्च संस्था ने इसका मान बढाया.. वहीं "ढोराय चरित-मानस" आज भी कलकत्ता यूनिवर्सिटी की कोर्स में आज भी पढाई जाती है।
...दिनों बाद मामा जी के साथ के पल भी बङे मर्मस्पर्शी रहे। पिछले दिनों कैंसर से जूझते.. उनकी बनाई पेंसिल स्केचों ने मन मोह लिया.. और तो औऱ उन्होंने भी मेरी साहित्यिक मुखरता का दिल से अभिज्ञान लिया। ..फिर मामी जी के हाथों से बनी गरमा-गरम फिश फ्राई को खाने के बाद ही घर को लौटा।
 #SatinathBhaduri  #Jagori 

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गुंजा रे ँं...चंदन.. चंदन.. चंदन..

गुंजा रे ँं...चंदन.. चंदन.. चंदन..

 आज वर्षों बाद भी ये बोल.. मेरी मिट्टी के सौंधेपन को लिए कानों को छू ही जाती है.. और मैं शहरनुमा बदले माहौल में.. एक बार फिर.. खुद को जमींदोज कर ..झूठ का नकाब ओढ आगे बढता चला जाता हुँ। अब ना तो गाँव की उन वादियों से कोई गूंज ही आती दिखती है.. न तो चंदन ही अपनी खुशबू बिखेरे नदी किनारे खङा नजर आता है। ..वक्त के साये ने कितना कुछ बदल कर रख दिया। ..फिर हम जा भी किधर को रहे हैं। ...भावनाऐं बदल रहीं है ..हम बदल रहे हैं या ..कुछ औऱ हमें बदलने की साजीश में लगा है। उन्हें वो क्यों नही मिल पा रहा.. जहाँ जीवन है ..अल्हङपन है ..सादगी है। ..आज के बदले माहौल में मानो सब-कुछ ही बदल गया ..भोजपुर बिहार से होकर गुजरते वक्त सुनाई पङे कुछ फूहर भोजपुरी गानो ने तो मेरे पैर ही जकङ लिए। ..फिर याद आने लगे कुछ ऐसे लुभावने दृश्य औऱ मीठे स्वर भी ..जिन्हें आज के बाजारू औऱ विषाक्त माहौल के बीच.. अपने विचार-मंथन के कलेक्शन में रखने का जोखिम भी उठा लूं तो... अमृत-वर्षा से कुछ कम ना होगा।



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विनायक रंजन  www.vipraprayag.blogspot.in

थ्योरी आफ सेल्फ-रिऐलाईजेसन और आटोबायोग्राफी आफ #योगी का सत्य..

थ्योरी आफ सेल्फ-रिऐलाईजेसन और आटोबायोग्राफी आफ #योगी का सत्य..।

 जैसे मेरे कदम.. रिऐलाईजेसन की रहस्यों से भरी वादियों की ओर बढ चूके थे। धन्यवाद उन वैज्ञानिकों का जिन्होंने मेरे जिज्ञासु मन का मार्गदर्शन.. अपने कठोर दिशानिर्देशों से मेरा अकल्पित लक्ष्य निर्धारित किया। बक्सर कॉलेज के एक सुदूर गाँव की एक लाईब्रेरी से ही.. सर्वप्रथम मेरा परिचय "आटोबायोग्राफी आफ योगी" से करवाया गया। ..चाहे वह आज के गैजेट्सपूर्ण दुनिया का सिद्धतंत्र हो या अमेरिकी हिप्पी प्रवृत्तियों का अभियोग या आध्यात्मिक-सुफिज्म् का विचरन या पुरातन योगतंत्र का अनुसंधान ..ये सभी वैज्ञानिक मतो का ही आधार रखते हैं। कैलाश-शिखर आधार सशक्त होकर भी.. सर्व-शून्य एकाकी ही है.. प्रशांत को छूने.. हिमखंडों को विसर्जित करना ही होता है..। प्रशांत.. वृहत विहंगम.. शहरीकरण व मॉडर्नाइजेसन से कोसों दूर.. अब तो राजतंत्र के सिक्कों से निकल.. प्रजातंत्र के कुनबों मे सिसकता मजबूर..। क्रिया-योग.. के दर्शनों में ज्ञानपूर्ण-हिमखंड सतहों में उतरता दिखा.. महावतार बाबा के कितने अवतार इन सुदूर अंतों में दिख गए.. अपनी-अपनी जैविक कंदराओं में.. तपस्या में लीन एक विकट मानवीय अवस्था..। इन्हें बाजार भी तो चाहिए.. मनोनुकूल विचार व व्यापार भी तो चाहिए.. बस क्रियाओं को योग चाहिए..। तब तो कभी व्हेन सांग तो कभी स्टीव जॉब्स को इन्हीं क्रिया-योगों ने खिंचा..। थोङा आध्यात्मिक.. तो थोङा वैज्ञानिक..। परमहंस योगानंद के दर्शाऐ.. थ्योरी आफ रिएलाईजेसन इन्हीं सुदूर-अंतों में जागता है.. आटोबायोग्राफी आफ योगी की प्रतिमुर्ति लिए.. जो भेदभाव रहित परिदृश्य ही तो है.. एक निरंतर क्रियात्मक योग... 

 #ParamhansaYogananda #AutobiographyofaYogi #SelfRealizationFoundation

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प्रेमचंद की वापसी.. विचित्र वन में...

    सुबह-सुबह ट्रेन जाकर रूकी महकवि संत तूलसीदास के रघुनाथपुर में.. पूरब की ओर से बक्सर का पहला स्टेशन। कहते है यहाँ तूलसीदास बनारस घाट से आकर महीनों रूका करते थे.. और फिर यहाँ इसके उत्तर दिशा में प्रसिद्ध बाबा बरमेश्वरनाथ शिव का प्राचीन सिद्धपीठ मंदिर भी है। कहते हैं उत्तर काठमांडू के बाबा पशुपतिनाथ.. पुरब देवघर के बाबा वैद्यनाथ व पश्चिम दिशा बनारस के बाबा काशी विश्वनाथ के त्रिकोण के मध्य अवस्थित ये एक अपरुपी ब्रह्मपीठ है।  कुछ दिनों पहले मैं दोनो तीर्थ कर आया.. तूलसीस्थान के साथ बाबा बरमेश्वरनाथ को जल चढा आया। सच में यहाँ आकर जिन्दगी ठहर सी जाती है.. हर दिन कुछ ना कुछ नया दिखा ही जाती है। बङे शहरों में ऐसा क्यों नहीं लगता.. जो यहाँ सब अपने से लगते हैं.. यहाँ अब तो और भींगने को खादी पहन घूमता हूँ.. अच्छा लगता है जो इनके निकट सा लगता हूँ। 

पश्चिम दिशा से एक पैसेंजर ट्रेन रघुनाथपुर आ रूकी.. ये क्या जो सभो के हाथों में छोटी बाल्टी.. जिसमें आधा पानी भरा और एक कपङा डूबोया.. लगभग सभों के साथ कुछ ऐसा ही..। जो पता चला.. उन पानी भरे बाल्टियों के कपड़ो में लिपटा पनीर व छेना जो रहता है.. ये लोग इस जगह अपने पनीर व छेनों को पास के मिठाई वाले दुकानदारों को बेच.. कुछ अपनी रोजमर्रा की समानों को खरीद वापसी वाली ट्रेन पकङ लेते हैं। ..फिर ज्ञात जो हुआ इस रघुनाथपुर में दूध फारना गौ-हत्या बराबर जो है ..बस ये प्रथा वर्षों से चली आ रही है.. क्यों विचित्र सी है ना ? ऐसे बहूतों प्रसंग मिल जाऐंगे.. छूने को.. बस अगर आपने इन विचित्र वनों में इत्मिनान से लौटने को साध रखा हो तो.. नहीं तो कौन जोखिम लेता है अब..। चलते फिरते कितने ही किस्से रिसते दिखेंगे.. मगर इतना भींग कौन लिखता है अब।

   ट्रेन में ही एक जनाब मिले.. मेरे रूझानों को देख बिफर से पङे.. मानो वर्षो से कुछ छिपा रखा हो या इनके आवाजों को दबा दिया गया हो..। अपने लेखों के पेपर कटींग्स को निकाल दिखाया.. वन्य-जीव संरक्षण व क्षेत्र-सौन्दर्यीकरण जैसे कितने ही मसलों पे लिख रखा था इन्होंने.. न जाने कितनी बार दिल्ली बैठे मंत्रियों की दौड़ लगाई लेकिन वर्षों बीते नहीं हुई कोई सुनवाई..। आप ही कहें आज के दौर में इन प्रेमचंदों की वापसी संभव है क्या ? नहीं लगता हिन्दी साहित्य सम्राट प्रेमचंद का ईंगलीश दौर ही अच्छा था.. कम से कम मोबाईल और टेलीविजन बिना.. शब्द-साहित्य में कुछ सजोने.. कुछ खोने को तो मिलता था। 




~ विप्र प्रयाग
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१० पैसे की भक्कागीरी...

१० पैसे की भक्कागीरी...।

 ..आज फिर एक नया साल आ गया ..लेकिन बचपन के दिनों का वो #स्वाद नहीं मिला। ..चौंक लगे मुस्लिम की वो भक्के वाली #दुकान नहीं मिली ..जलती अंगिठियों में पानी के भाप पे पकती ..बचपन की वो #मुकाम नहीं मिली। ..जब हम नए साल एक जनवरी के दिन जेबों में दस पैसियों को लेकर पास लगे चौंक की ओर दौड़ जाया करते ..सुलगते चूल्हों पर पिसे चावल के गरमागरम भक्के को पकता देखते। उस कङाके की ठंड व घने कोहरों के बीच.. जमीन पे बैठ कभी बुढा मुस्लिम तो कभी उसकी बीबी.. बङे जतन से भक्के को पकाते..। आस-पास पङोस के सारे बच्चे बस खिंचे चले आते.. पास बैठ घंटो ये नजारा देखते रहते..। कभी ठंड से ठिठुरते हाथों को पॉकिट से निकाल.. उन अंगीठियों से हाथ भी सेंकते.. तो कभी पीठ पे गर्म सेंक लगाते.. सब एक साथ..। ना धर्म की दिवार.. न ऊँच-नीच.. मजहब तो बस गुङ लगे भक्के की स्वाद का होता ..मीठा स्वाद ..नए साल के आरंभ का एक मीठा #संवाद..।

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