Saturday, 6 October 2018

मार्कशीट से मार्क्सशीट तक: एक शिक्षण चक्र..


..और गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा युगों तक भटकता रहा। एकलव्यों व बर्बरिकों के अंगूठे व शीश राजसंघों को समर्पित होते गए। सतयुगी क्षत्रिय कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन से ज्यादा द्वापरकालिन कृष्णार्जुन सुशोभित रहे। फिर पौराणिक संदर्भों में ऐसे कितने ही रुप व पात्र रहे, जिन्हें ज्ञान के एक नए संधिकालों के बाद भुला दिया गया या फिर श्रेष्ठ पूज्य परकता से दूर ही रखा गया। एक विष्णु अवतारी ने दुसरे विष्णु अवतारी का समूल नाश किया। कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन विष्णु अवतारी का विनाश भी तो एक विष्णु अवतारी परशुराम भगवान ने ही किया.. मानों सॉफ्टवेयर की लेटेस्ट वर्जन ओल्ड वर्जन पे हावी हो चली हो। हैहयवंशी चक्रवर्ती कार्तवीर्य को आज भी उनके राजगढ महिष्मति में भगवान सरीखे ही पूजा जाता है। फिर जिन शिवशक्तियों व ब्रह्मास्त्र युक्त सुसज्जित द्रोणपुत्र अश्वत्थामा हो, तो कुरुक्षेत्रिय व्यूह रचना में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा छल क्यों? रणक्षेत्र में एक गुरु व गुरुपुत्र बाधक क्यों? फिर वैसे गुरु जिन्होंने अपने राजधर्म निर्वाह में एकलव्य जैसे भील धनुर्धर का मान भी दान स्वरूप लेने में गुरेज ना कि हो तो शिव भक्त व पांडव पौत्र बर्बरिक की कुल निष्ठा ने शीश दान देकर भी हरि भजन को जीवित रखा।

  इन हरि भजनों को जीवित रखने के कृत पुराणों के भिन्न संस्करणों ने ही नहीं, बल्कि आज के जीवन खंडों में भी जारी है। मनु काल या मनु कल्प-ज्ञान स्मृतियों को लेकर आज के कालखंडों भी एक उत्सुकता बनी ही रहती है, तो फिर बदलते समावेशों में "मनुस्मृति" सांख्य-दर्शन भी "कामायनी" बनकर जयशंकर प्रसाद की काव्य रचनाओं में निढाल बह ही निकलती है। कल्प गर्भ विन्यास के मन्वंतरों में प्रथम मनु "स्वयंभू मनु" के काल के बाद तो सीधे वर्तमान में चल रहे मन्वंतर सातवें मनु "वैवश्वत मनु" का कालवर्णन ही मिल पाता है। संभवतः द्वितीय मनु से लेकर छठे मनु के काल-कल्प गंधर्विय व्यवस्थाओं के कारण ही आज के सनातनी संस्करणों में जगह नहीं बना पाते; वस्तुतः इन शक्तिपुंज आदिर्भावों को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। नवीन संस्करणों में ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा वैष्णवी मतों पे शैव मतों का भारी पड़ना; मानों यक्षों ने आज भी अपनी जगह बचाऐ रखने में कामयाबी हासिल की तो गंधर्व लोक दुर जाता रहा।

  फिर दुर जाते इन गंधर्व लोकों को महर्षि शुक्राचार्य व महर्षि  और्व ने भी पाटने का कार्य किया तो सनातनी परंपराओं में बढते शैव मतों के बीच वैष्णवी परंपराओं को सृजित करने का कार्य भक्ति आंदोलन के घटकों ने बखूबी किया। पंद्रहवी शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने राधा को कृष्ण के संग बिठा पुन: सम्मानित किया। वस्तुतः आज भी सनातनी परंपराओं में जगन्नाथपुरी में बहन सुभद्रा ही अपने भ्राता भगवान श्रीकृष्ण व बलराम संग पूज्य हैं। वैष्णवी परंपराओं के इस प्रादुर्भावों ने शैव मतों को भी दुर धकेला। उदाहरण स्वरुप शिव ज्योतिर्लिंगो में एक भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का मूल स्वरुप कामरुप भूभाग असम राज्य में होकर भी ये आज महाराष्ट्र राज्य में स्थापित व पूजित है। या यूं कहें कि आज के कालखंडों में भी गंधर्विय शक्तियाँ अपने पुनर्आगमण हेतु आतुर अपने अपडेटेड वैष्णवी वर्जन के साथ मौजूद है.. फिर देहरुप सौन्दर्य व गंधर्विय कामाग्नियों के निस्तारण हेतु सनातनी परिप्रेक्ष्यों के वर्तमान मन्वंतर में भगवान विष्णु भी वामन रूपधारण को ही बाध्य हैं। स्मृतियाँ लिए ये गंधर्विय शक्तियां आज फिर किन वर्णों या धर्मों में सुशुप्त हैं तो इसका सीधा संबंध तिब्बत व चीन में व्याप्त बौद्ध पीठों की मौजूदगी से है तो फिर जैन, जरथ्रुष्ट व ईसाई मतों व विचारों में भी ये बहुत कुछ संवर्धित है।

  राजा दशरथ की तीन पत्नियों में कैकेयी का नाम श्रेष्ठ ही समझा जाऐ; अन्यथा महाज्ञानी रावण को भगवान श्रीराम के हाथों मोक्ष नहीं मिल पाता। ये एक शोध का ही विषय है या फिर कुछ गंधर्विय शक्तियों का मेल। सतयुग के बाद त्रेता में ये कलियुगी राग विद्वेषणा क्यों? राम ज्येष्ठ थे, तो चौदह वर्षों का वनवास। कुछ महत्वपूर्ण कड़ियाँ कैकेयी तो कुछ महाभारत कालिन धृतराष्ट्र व पत्नि गाँधारी तक मिलती दिखती हैं। रामायण व महाभारत के दोनों ही संदर्भों में वनवास दिखता है। फिर इन वनवासों के साथ दिखती हैं कुछ गंधर्विय जठर दृढता भी।

..continued 

Wednesday, 3 October 2018

मैं बस एक स्वर्णिम कोशिश करता जाता हूँ..

..मैं बस एक स्वर्णिम कोशिश करता जाता हूँ।
..नव-सृजित पहचान कराता जाता हूँ।।
..जीता जागता और जगाता हूँ।
..क्योंकि मिले सफर में प्रथम तुम।।
..अपने ईश्वर को समक्ष ही पाता जाता हूँ।
..मैं बस एक स्वर्णिम कोशिश करता जाता हूँ।।
..चाह नहीं अंतरिक्ष की।
..अंतर-कक्ष में बैठना चाहता हूँ।।
..दूरियों के विष अंतरों को।
..अमृताक्ष में पिना चाहता हूँ।।
..स्वर्णिम हूँ ..स्वर्णिम मदों में जीना जानता हूँ।
..मैं बस एक स्वर्णिम कोशिश करता जाता हूँ।।

#मेरीकविता

Tuesday, 2 October 2018

मेरा ब्लैक एंड व्हाइट गंगा-कोशी-महानंदा ट्रैंगल..

मैं खुद को अगर घोषित करूँ तो हमेशा मैं पूर्णियाँ कटिहार व भागलपुर के मध्य की इन अमूल्य कथानक धरोहरों के सम्मुख ही जीना पसंद करूंगा। सर्वप्रथम विभूति भूषण बंदोपाध्याय की लिखी "पाथेर पांचाली" जिसे सुविख्यात निर्देशक सत्यजीत रे ने ब्लैक एंड व्हाइट कैन्वास पे बखूबी उकेरा। वस्तुतः विभूति भूषण बंदोपाध्याय को प्रेरण शक्ति जीवन के इन्हीं क्षेत्रों में आकर मिलती थी। फिर मेरे पूर्णियाँ के जन्में नामचीन बांग्ला साहित्यकार सतिनाथ भादुड़ी की लिखी स्वतंत्र भारत की पहली एंटी करप्शन थीम बेस्ड नॉवेल "जागरी" पे ही राज कपूर की "जागते रहो" फिल्म बनी थी। खास बात ये रही कि सतिनाथ भादुड़ी ने इस फिल्म से किसी भी तरह का क्रेडिट नहीं लिया.. वे मानते थे कि लेखन और फिल्म मेकिंग ये भाव अभिव्यक्ति की दो भिन्न विधाऐ हैं। तीसरी प्रमुख फिल्म बिमल रॉय की बंदिनी, जिसकी शुटिंग कटिहार जिले की मनिहारी गंगा घाट तो जेल दृश्यों की शुटिंग भागलपुर सेन्ट्रल जेल में हुई थी। चौथी साहित्य सम्राट शिरोमणि शरतचंद्र की देवदास, जो पारो व चंद्रमुखी पात्रों से सुसज्जित उनकी खुद की भागलपुर की ही कहानी है.. और यहाँ मिले कड़वेपन के बाद ही वो भागलपुर से कलकत्ता और फिर कलकत्ते से रंगून बर्मा चले गए, और फिर वहीं से अपने लेखों व कहानियों को प्रकाशित करवाया। अंत में पाँचवी; मेरे पूर्णियाँ अररिया हिंगना अंचल के रिपोर्टाज किंग फनिश्वर नाथ रेणु की लिखित कहानी संकन "मारे गए गुलफाम" पे बनी राजकपूर व वहीदा रहमान की फिल्म "तीसरी कसम"।



#PatherPanchali #JaagteRaho #Bandini #Devdas #TeesriKasam

सतिनाथ भादुड़ी की "जागरी" १९४६ से निकलता "जागते रहो" १९५६ का सच..


१९५६ की राज कपूर अभिनीत फिल्म जागते रहो, तत्कालीन स्वतंत्र भारतीय सामाजिक अर्थव्यवस्था की जड़े खंगालती एक व्यंग्यात्मक फिल्म है। इसने स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत हमारे भारतीय समाज के सामने एक चेतावनी प्रस्तुत की थी जो समाज को पूरी तरह भ्रष्ट होने से बचा सके। यह एक हताशा से भरे समाज में मौजूद मासूमियत व इन्नोसेंस को बचाये रखने का एक सटीक प्रयास भी था। सामाजिक रुप से फिल्म का उद्देश्य केवल इसी बात की सफलता पे केन्द्रित थी क्योंकि पिछली सदी के पचास के दशक से अब तक पिछले साठ सत्तर सालों में भ्रष्टाचार का ग्राफ बेतहाशा बढ़ चूका है।

जागते रहो फिल्म कथानक सामाजिक व्यंग्य की नदी पर हास्य की लहरें बहाती हुयी आती है और भ्रष्टाचार की जम चुकी चट्टानों को परत दर परत खुरचने और रेत बनाने का काम करती जाती हैं। जागते रहो सिर्फ वही नहीं है जो साफ साफ परदे पर दिख जा रही थी बल्कि यह एक रुपक की भाषा में भी काम करती है। शायद बिल्कुल ऐसा न होता हो पर फेंटेसी के स्तर पर विचरती हुई प्रकृति को लेकर यह घनघोर यथार्थवादी स्वभाव की फिल्म के रुप में सामने आती है।

भ्रष्टाचार से ग्रसित भारत के एक बड़े शहर में खड़ी वह इमारत, जहाँ गाँँव से आया भूखा प्यासा एक गरीब अनाम आदमी राजू (राज कपूर) पुलिस के डर से एक इमारत में घुस जाता है और उस ऊँची इमारत में रहने वाले लोगों के काले कारनामों को देख लेता है। यह सफेदपोशों के शान से रहने की इमारत है। यहाँ अवैध शराब बनाने वाले रहते हैं, यहाँ नकली नोटों को छापने वाले सेठ रहते हैं, यहाँ काला बाजारिये भी रहते हैं और नकली दवाइयाँ बनाने वाले भी। अनाम घुसपैठिया राजू न चाहते हुये भी इस इमारत में भिन्न भिन्न लोगों की कारगुजारियों का गवाह बनता जाता है।

लोगों की दूसरों के जीवन में बिना मतलब दखल देने जैसी सामान्य बुराई पर भी फिल्म खूब फोकस करती है।
कम ही फिल्में इस तरह से लोगों के समूह को आइना दिखा पाती हैं जैसे जागते रहो दिखाती है। एक ऐसे युवा भी हैं जिन्हे भीड़ का नेता बनने का शौक है। गैर कानूनी काम करने वाले धर्मात्मा और सफेदपोश बने रहते हैं क्योंकि उन्हे कानूनी व्यवस्था पकड़ नहीं पायी और सामाजिक व्यवस्था उन्हे उनके धन के कारण सम्मान देती आ रही है।

राज कपूर ने न सिर्फ इस अनूठी फिल्म में काम किया बल्कि इसे अपने बैनर आर के बैनर तले निर्मित भी किया और निर्देशन की भूमिका सौंपी शम्भू और अमित मित्रा को। फिल्म शुरुआत के कुछ देर बाद ही इसे याद रख पाना मुश्किल हो जाता है कि परदे पर राज कपूर कहीं मौजूद भी हैं। मुश्किल से तीन चार संवाद पाने वाली यह भूमिका उनके अभिनय के लिहाज से ज्यादा उनके परदे पर उपस्थित रहने की वजह से अविस्मरणीय कही जाएगी। कुछ दृश्य़ों में लगता है कि वे नाटकीय हो रहे हैं पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है राज कपूर खो जाते हैं और मुसीबत का मारा वह अनाम गरीब चरित्र परदे पर हावी हो जाता है जिसके सामने परेशानियाँ आती रहती हैं और जो अंजाने में ही उस इमारत में रह रहे लोगों और अपराधियों के भेद खोलता चला जाता है।

 यह ऐसी फिल्म है जिसमें फिल्म का अंत आने पर ही राज कपूर के अभिनय प्रदर्शन की कड़ियाँ जुड़ पाती हैं। जहाँ दर्द बयाँ करने का क्षण आता है वहाँ राज कपूर केवल आँखों से ही संदेश संप्रेषित कर देते हैं। जागो मोहन प्यारे जागो गीत में वे भावनाओं की अभिव्यक्ति में ही अपने अंतर्मन को जी रहे हैं।


 मनोविज्ञान के स्तर पर आसान नहीं है इस चरित्र को निभाना। कभी प्रेमचंद ने अपनी किसी कृति में लिखा था– "भय की चरम सीमा ही साहस/(दुस्साहस) है" और जागते रहो में इस कथन को साक्षात रुप से घटते हुये देखा भी जा सकता है। लोगों से बचते बचाते, भागते दौड़ते राज कपूर थक जाते हैं, पहले वे एक सेठ के गुण्डों के हाथ पड़ जाने से डर के मारे वे सब काम करने को तैयार हो जाते हैं जो सेठ उन्हे कहता है। सेठ को अपनी खाल बचाने के लिये और दुनिया के सामने खुद को सफेद्पोश बनाये रखने के लिये एक मुर्गा चाहिये जो उन्हे इमारत में एक अनाम घुसपैठिये चोर के रुप में कुख्यात हो चुके राज कपूर में दिखायी दे जाता है। वे अपने सारे काले धंधों की कालिख इस व्यक्त्ति पर पोत कर खुद को पाक दामन सिद्ध कर सकते हैं। वे नकली नोट बनाने वाले फर्मे और बहुत सारे नकली नोट राज कपूर के शरीर के साथ बाँधकर उन्हे खिड़की से बाहर जाकर पाइप के सहारे नीचे जाने के लिये विवश कर देते हैं। भीड़ राज कपूर को देख लेती है और उन पर पत्थरों की बरसात हो जाती है। डर कर राज कपूर छत पर चढ़ जाते हैं जहाँ भीड़ उन्हे घेर लेती है, सेठ के आदेशानुसार उनके गुण्डे भी राज कपूर को मारने के लिये पहुँच जाते हैं क्योंकि राज कपूर का जिंदा रहना उन लोगों के जीवन के लिये खतरनाक साबित होगा।

भीड़ से घिरे अकेले निहत्थे खड़े राज कपूर के चारों तरफ मौत खड़ी है। एक अनाम चोर और अपराधी के रुप में मरना इस देहाती को मंजूर नहीं है और उनमें कहीं से आकर साहस का संचार हो जाता है वे पास पड़ी लाठी उठा कर भीड़ को ललकारते हैं। राज कपूर का मोनोलॉग फिल्म की रीढ़ की हडडी है। वे बताते हैं भीड़ को कि पानी की तलाश में उन्हे इस इमारत में आना पड़ा और उन्होने यहाँ रहने वाले सफेदपोशों के काले कारनामे देखे। वे एक किसान के बेटे हैं जो काम की तलाश में शहर आये हैं न कि कोई चोर। उनके संवाद देश को रसातल में गिरने से बचाने के लिये एक चेतावनी हैं पर भीड़ ने किसकी सुनी है? वहाँ से भी उन्हे भागना पड़ता है।
रोचक बात यह है कि फिल्म की शुरुआत में ही प्यासे राज कपूरको एक पुलिस वाले की वजह से डरकर उस इमारत में दाखिल होना पड़ता है पर वहाँ लोग उन्हे चोर समझ बैठते हैं और भाग-दौड़ में वे मौका आने पर भी पानी नहीं पी पाते। नरगिसको एक विशेष भूमिका में रखा गया है। वे अंतिम दृश्य में प्यासे राज कपूर को पानी पिलाती हैं।

हालाँकि जागो मोहन प्यारे जागो गीत के साथ साथ फिल्म खत्म हो जाती है और इस गीत के साथ साथ एक आशावाद फैलाने का प्रयास फिल्म करती है। परंतु पचास साल से लम्बे अरसे बाद पुनरावलोकन करने और विश्लेषण करने पर एक निराशावाद घर कर लेता है।
तब भीड़ से भागते राज कपूर को एक बच्चे के घर में घुसना पड़ता है और वह भी पहले अजनबी को चोर ही समझता है पर राज कपूर उस बच्चे के सामने टूट जाते हैं और रोकर कहते हैं कि वे चोर नहीं हैं। मासूम बच्चा उन पर विश्वास करता है। जब सब तरफ भ्रष्टाचार का अंधेरा फैल जाये तो नयी पीढ़ी के बच्चों के नये अस्तित्व से और उनकी शुद्ध उपस्थिति से ही कुछ आशा बंध सकती है। रोशनी तो उसी तरफ से आ सकती है।

रुपक के रुप में इस कड़ी को जोड़ें तो इस बच्चे का जन्म तब का माना जा सकता है जब भारत में संविधान लागू हुआ या इसका जन्म हुआ। उस साल जन्मी पीढ़ी का प्रतिनिधि बच्चा सन 1956 में उस कृषक के बेटे राज कपूर से मासूमियत से कहता है,” डरते हो… पर क्यों,… तुमने तो कुछ नहीं किया“? मासूमियत भरा विश्वास टूटे राज कपूर में बल का संचार करता है।

ऐसे निराशाजनक माहौल में फैज़ का कलाम याद आता है-

"ये दाग दाग उजाला, ये शब-गजीदा शहर..
वो इंतजार था जिसका, ये वो शहर तो नहीं,
ये वो शहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर..
चले थे यार के मिल जायेगी कहीं न कहीं,
फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल..
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल..
कहीं तो जाके रुकेगा सफीना-ए-ग़म-ए-दिल.."

लेकिन यह संभावना तो थी ही कि सन पचास में जन्मी उस पीढ़ी के कुछ लोग अपनी ईमानदारी सदा के लिए बचा कर रख पाऐंगे। देश में, समाज में अगर भ्रष्टाचार एक हद दर्जे को पार कर लेगी तब भी कहीं धीमी ही सही पर ईमान की लौ तो जलती ही रहेगी, नहीं तो ईमानदारी शब्द आज भी एक गाली बन कर ही रह गया होता।

(इंटरनेट गूगल के माध्यम प्राप्त विश्लेषण)
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     वर्ष २००३ के एक मिडिया मैनेजमेंट एग्जाम के इंटरव्यू के दौरान बैंडिट क्वीन फेम्ड सुप्रसिद्ध फिल्म प्रोड्यूसर श्री बॉबी सिंह बेदी के माध्यम से ही सतिनाथ भादुड़ी जी का नाम दुसरी बार सुना था मैने, और इसलिए भी.. कि मैं पूर्णियाँ बिहार से था.. और फिर शायद उनकी हमारे इस क्षेत्र से जुड़ी जानकारियाँँ काफी पुख्ता थीं। फिर ये हमारे पूर्णियाँ के सतीनाथ ही थे जिनके प्रेरणा व मार्गदर्शन से ही तब के रिपोर्टाज किंग फनिश्वरनाथ रेणु के कलम और प्रखर हो चले थे। २००४ में पूर्णियाँ के एक प्राईवेट इंजीनियरिंग कॉलेज को जॉय्न करने के बाद तो जैसे मैं इन साहित्य सम्राटों के आरामगाह में ही आ बैठा था। २००५ में एक बार अपने एक दोस्त की बराती जाने के क्रम में, मैं अपने स्कूली मित्रों के साथ अररिया के गिद्धवास होते हुए गाँव व खेतों के बीचोबीच होकर जाने वाली एक दुभर रास्ते से पहली बार फनिश्वरनाथ रेणु जी के मूल गाँव औराही हिंगना जा पहुंचा था। फिर अध्यापन के साथ यदा कदा मिलते कुछ साहित्यिक रुझानों व अवसरों से दिल बहला रहता। जानने पहचानने की इसी उत्सुकता लिए एक बार दुर्गा पूजा के दिनों में अपने पुर्णियाँ शहर के भट्टा दुर्गा बाड़ी जाने के क्रम में रास्ते पे बाँयी ओर चौराहे से लगी एक शिलापट्ट दिखाई दी.. लिखा था "सतीनाथ भादुड़ी पथ"..।

  दुर्गा बाड़ी से वापस घर लौटने के बाद.. ये सोच कि कुछ सफलता हाथ लगी हो.. मगर जैसे इस आवरण के भीतर मेरा प्रवेश अभी बाकी था.. सतीनाथ नाम के सिवा मेरे पास कुछ भी न था.. और इसलिये भी की ये शब्द मैने पहली बार कलकत्ता युनिवर्सिटी में पढ रहे अपने बचपन के मित्र से पहली बार सुना था तो दुसरी बार दिल्ली कुतुब सेंटर में एक सम्मानित फिल्म मेकर बॉबी सिंह बेदी से। करीब एक दो हफ्ते बाद रविवार के दिन सुबह करीब ८-९ बजे फुर्सत के साथ मैं पुर्णियाँ भट्टा बाजार को निकला। संडे के दिन भट्टा बाजार के मछली मार्केट का दृश्य कुछ और ही अनोखा मिलता है। तरह तरह की मछलियों का जखीरा पसरा रहता है। छोटी बड़ी.. आन्ध्रा या लोकल.. खास बात ये कि मछलियों के स्वाद पे रिसर्च के अगर आप शौकीन हैं तो ये मछली खरीददारी की एक महफूज जगह है। फिर स्मृतियों में बाँग्ला कल्चर के स्वाद को बैलेंस करती ये जगह भद्र-मानुषों के लिए एक माईलस्टोन से कुछ कम नहीं। रोजाना की भांति एक विशुद्ध प्रक्रिया.. हाथ में थैला लिए.. मछली के भाव को आजमाने वे निकल ही पड़ते और फिर लौटते कुछ हरी साग-सब्जियों की खरीददारी भी। इन उपसर्गों को लिए मैनें भी यहाँ की लोकल नदियों व तालाबों से लायी गई कुछ छोटी मछलियों की खरीददारी की। घर लौटने के क्रम में रहा ना गया और भट्टा दुर्गाबाड़ी के पीछे अपने रिटायर्ड जज मामा जी श्री अनादि गोपाल दत्ता से मिलने चला गया। भट्टा दुर्गाबाड़ी के इस छोर पे मानों साहित्य व कलात्मकता का मुझे एक संगम मिल सा जाता है। मामा जी से बातों बातों में जो एक निचोड़ मिलता दिखा.. वो ये कि राज कपूर की "जागते रहो" फिल्म का आधार सतिनाथ भादुड़ी की "जागरी" ही थी। भले ही जागरी कथानक व फिल्म स्टोरी लाईन में अंतर रहा हो.. परंतु मूल स्वर एंटी करप्शन बैक-ग्राउंड ही था, जिसका क्रेडिट लेने से सतीनाथ ने साफ मना कर दिया था। उनके अनुसार लेखन व फिल्म मेकिंग ये दो अलग अलग सी विधाऐं हैं। सतीनाथ व जागरी से जुड़ी इन अंतर्मनों को लिए मैं वहाँ से चल तो पड़ा था, लेकिन रह रह कर कुछ सवाल मन में उठते चले जा रहे थे। एक ऐसा बोध जहाँ वर्णित शब्द श्रृखलाऐं ही अप्रतिम हो.. अंत हो। फिर अपने काल खंडों में हम कितने ही नए पात्रों व मंथनों से इसकी रुप सज्जा कर लें.. लेकिन लिखे शब्दों के अमरत्व को कभी दुबारा जी नहीं सकते। अपने नए शोधों व जानकारियों में मिले तथ्यों में सतिनाथ के जीवन के बारे में कुछ लेख इंटरनेट के माध्यम तो समय समय पे मेरे जज मामा व उनके छोटे भाई साहित्य प्रेमी श्री अनंत गोपाल दत्ता से प्राप्त होता चला गया।

अपने साहित्यिक अलंकारों में सतीनाथ भादुड़ी को "चित्रगुप्त" नाम से नवाजा गया था। इनका जन्म २७ सितंबर १९०६ को हमारे पूर्णियाँ बिहार में हुआ था। इनके पिता इंदुभूषण भादुड़ी पेशे से एक वकील थे, जिनका पैतृक स्थान पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के कृष्णा नगर तहसील में था। याद रहे कि ये ब्रिटिश हुकूमत का वो दौर था जब आज के दौर का बिहार, झारखण्ड व उड़िसा.. पश्चिम बंगाल के साथ मिलकर बंगाल युनाईटेड प्रोविंस के नाम से जाना जाता था। इस युनाईटेड प्रोविंस की सीमाऐं आज के बांग्ला देश की कुछ हिस्सों को लेकर पश्चिम में वाराणसी तक जा मिलती थी तो उत्तर में पर्वतीय छोड़ दार्जिलिंग व असम के कुछ हिस्सों को लेकर दक्षिण में उत्कल उड़िसा तक जाती थी। फिर इस ब्रिटिश हुकूमत के कालखण्ड में वकालत का पेशा एक अति सम्मानित पेशा था, जो भारतीय जन मानस की मुखरता का एक सटीक साध्य भी था। अपने बचपन की पढाई पूर्णियाँ में करने के बाद सतीनाथ ने पोस्ट ग्रैजुएशन इकोनॉमिक्स एम ए की डिग्री पटना युनिवर्सिटी से प्राप्त की और पुनः अपने पिता के रास्तों पे चल कर कानून की पढाई भी पटना में रहकर ही पूरी की थी। वर्ष १९३१ में लॉ की डिग्री लेने के बाद १९३२ से लेकर १९३९ तक पटना हाईकोर्ट में ही वकालत की प्रैक्टिस करते रहे।

भीरु स्वभाव के साथ अध्यात्म और साहित्यिक बैकग्राउण्ड में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रविन्द्रनाथ टैगोर व शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की छाया तो भला देशभाव में ये आनन्द मठी भी कब तक रुका रह सकता था। बस क्या था, एक स्थिर मन लिए प्रोफेशनल वकालती चोला उतार फेंका और कूद पड़े आजादी के अग्निपथ में। अपने आंदोलन में उन्होंने सर्वप्रथम काँग्रेस को जाय्न किया और फिर अपने गृह नगर पूर्णियाँ काँग्रेस इकाई के डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी भी बनाऐ गए। अपने तेज संबोधनों व जोशिले रुख के कारण देश छोड़ो आंदोलन में एक सक्रिय भागीदारी के कारण सतिनाथ भादुड़ी दो बार जेल भी गए। पहली बार वर्ष १९४०-४१ तो दुसरी बार वर्ष १९४२-४५.. दोनों ही बार इन्हें भागलपुर सेन्ट्रल जेल में रखा गया। कहते हैं १९४२ भागलपुर जेल में ही पहली बार फनिश्वर नाथ रेणु भी इनके संपर्क में आऐ। उस समय सतिनाथ जेल में ही रहकर अपनी लेखन प्रतिभा को तराश रहे थे और अपनी प्रथम साहित्यिक रचना "जागरी" को लिखना भी उन्होंने यहीं आरम्भ किया। फिर अपनी साहित्यिक अभिरुचियों की साझेदारी भी पास आऐ फनिश्वर नाथ से किया करते और फिर इन्हीं मेल जोल में उन्होंने फनिश्वर नाथ को अपने रिपोर्ताजों से निकल उपन्यास लेखन के तेज को दिशा प्रदान की। जानने वाले प्रथमत: सतीनाथ भादुड़ी को ही फनिश्वरनाथ रेणु का साहित्यिक अभिष्ट मानते हैं।

१९४२ का वो दौर जब समूचा भारत महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन में संघर्षरत था। भारत की आजादी के दिवाने उन अनेकों क्रांतिकारियों व देश भक्तों में सतीनाथ भी एक थे, जिन्हें गिरफ्तार कर भागलपुर की जेल में रखा गया था। भागलपुर जेल की उन्हीं चहारदीवारियों के बीच भारत को आजादी के एक नए परचम थामें देखने की कशमकश तो साथ ही एक दुर्गम्य विवशताओं का मंजर भी साथ हो चला था। सतीनाथ भादुड़ी की जागरी उसी विवशताओं से नए भारत की प्रतिमुर्ति थी। जहाँ गरीबी और बढते असंतोष के बीच भ्रष्टाचार और अन्याय का बोलबाला था। सामंती प्रथाओं व साथ में अंग्रेजी सल्तनत की जी हूजुरी में भारत का एक धनाढ्य तबका तो फल फूल रहा था लेकिन इस फल फूलते दृश्यांतर में पीछे छूटता एक निर्बल व शोषित वर्ग तो बस मुँह ताकता ही नजर आता। वर्ष १९४५ में जेल से निकलने के बाद सतीनाथ भादुड़ी की बांग्ला भाषा में लिखी जागरी का प्रकाशन वर्ष १९४६ में कलकत्ता से संभव हो पाया था। भारतीय स्वतंत्रता की पूर्व संध्या व बढते जन असंतोष के बीच दंगों का दंश झेलता पूरा बंगाल परिक्षेत्र। इन सभों के मध्य ही सही "जागरी" के उत्कृष्ट लेखन ने हताशा से भरे आमजनों में ढांढस बनाऐ रखने व सही दिशानिर्देशों को देने में एक सक्षम योगदान दिया था।




१९४७ में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इन्होंने १९४८ में कॉन्ग्रेस पार्टी को त्याग कर सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए और सामाजिक कर्तव्यों से प्रेरित होकर पूर्ण रुप से साहित्य धर्मिता का ही चुनाव किया। १९४८ में गणनायक, १९४९ में चित्रगुप्तेर फाईल व ढोढाय चरीतमानस के प्रथम संस्करणों ने इन्हें अवसादों से घिरे आजाद भारत में बाँग्ला साहित्य का नया मसीहा बना दिया। बांग्ला साहित्य के प्रति इनके उत्कृष्ट योगदान के कारण वर्ष १९५० में गुरु रविंद्र नाथ टैगोर के मरणोपरांत इन्हें प्रथम रविन्द्र नाथ साहित्य पुरस्कार से नवाजा गया। अपने युरोप व पेरिस यात्राओं की कथाओं का अनुमोदन इन्होंने अपनी यात्रा-वृतांत १९५१ में प्रकाशित "सत्यी भ्रमण कहिनी" के द्वारा किया। इसके पश्चात १९५१ में ही इन्होंने ढोढाय चरितमानस के द्वितीय खंड, १९५४ में अचिन रागिनी व परिचिता, १९५७ में संगकट, १९६४ की आलोक दृष्टि के साथ अनेकों रचनाओं व लेखों का प्रकाशन कलकत्ता व पूर्णियाँ के मध्य रहकर ही किया और अंततोगत्वा ३० मार्च १९६५ को चिर निद्रा में हमेशा के लिए विलीन हो गए। सतीनाथ की अप्रतिम कृतियों में जागरी ने जहाँ आजाद भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार व बंगाल विभाजन के दंशों को बखूबी चित्रित किया तो वहीं उनके ढोढाय चरितमानस में कोशी अंचल के सामाजिक जीवन का चित्रण साफ झलकता है। इनकी अन्य मुख्य रचनाओं में दिग्भ्रांत, रथेर तले, कृष्ण कली, पंक तालिका आदि प्रमुख हैं तो कर दातार संघ जिन्दाबाद कहानी में हास्य के माध्यम से मानवीय विकृतियों को भी उजागर किया है जो झूठ और बेईमानी से उपजती है।



इंटरनेट व आमजनों द्वारा प्राप्त जानकारियों में भले ही ये अपनी साहित्यिक निधियों के शिखर पर विराजमान रहे हों.. लेकिन इनका मन हमेशा कलकत्ता से निकल कटिहार पूर्णियाँ के रास्तों में संघर्षरत एक दरिद्रनारायण पात्र को ही ढूंढता नजर आया और फिर इनके पूर्वकालीन व समकालीन कहे जाने वाले अनेक साहित्यिक विभूतियों में स्थापित विभूति भूषण बंदोपाध्याय, बनफूल, केदारनाथ बंदोपाध्याय, फनिश्वरनाथ रेणु आदि को भी गंगा-कोशी व महानंदा नदियों की गोद में बसा का ये सांस्कृतिक प्रक्षेत्र खुब रास आया था। फनिश्वरनाथ रेणु की सुप्रसिद्ध कृति मैला आँचल भी स्वतंत्रता आंदोलन के काल की ही कृति मानी जाती है। बांग्ला भाषी साहित्यकारों के साथ कटिहार अररिया फारबीसगंज से लेकर सहरसा कोशी अंचल तक फैले तत्कालीन पूर्णियाँ प्रमंडल के अभिन्न हिन्दी भाषी साहित्यकारों में फनिश्वर नाथ रेणु के साथ लक्ष्मीनारायण सुधांशु, जनार्दन झा द्विज, वफा मलिकपुरी, अनूपलाल मंडल आदि साहित्यकार आज भी शीर्षस्थ बने हुए हैं।


(पूर्णियाँ आकाशवाणी केन्द्र से प्राप्त पेंटिंग)

पूर्णियाँ भट्टा दुर्गाबाड़ी स्थित इंदुभूषण पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना स्वयं सतीनाथ भादुड़ी ने ही सन् १९३८ में की थी। सामाजिक प्रयासों से आज भी ये लाइब्रेरी अनेकानेक हिन्दी व बांग्ला साहित्य की दुर्लभ पुस्तकों को बड़ी ही तल्लीनता से सहेजे हुए है। पूर्णियाँ गांगुली पारा भट्टा दुर्गाबाड़ी स्थित उनके निज निवास वाले मार्ग का नामकरण भी सतीनाथ भादुड़ी पथ से ही सुशोभित है। वर्तमान में उनके पैतृक निवास के मालिक व ईन्कम टैक्स लॉयर श्री डोकानियाँ सतीनाथ भादुड़ी से जुड़ी अनेक जीवन वृत्त साक्ष्यों का उल्लेख बड़े हर्ष से करते हैं। अपने कम उम्र में ही सतीनाथ ने साहित्यिक प्रेरण की वरमाला इस तरह पहनी की जीवन प्रयंत एक वैवाहिक वरमाला कोसों दुर ही खड़ी रही। श्री डोकानियाँ अपनी बातो में कुछ मर्मस्पर्शी पत्राचार लेखों का जिक्र बड़ी दिलचस्पी से करते हैं.. जिसमें सतीनाथ के परिजनों द्वारा सतीनाथ के विवाह संबंधी समाधानों का सहर्ष प्रयास दिखता है। उस जमाने में उनके इस निवास से महज कुछ ही फासले से ततमा टोली की बस्ती दिखती थी, जिसका जिक्र उन्होंने बखूबी अपने "ढोढाय चरितमानस" में किया भी है। जानकारों के अनुसार वे केवल तन से कलकत्ता के अधीन थे जबकि उनका मन हमेशा पूर्णियाँ के परिदृश्यों में ही विचरण करता रहता। वे जब भी कलकत्ते से पूर्णियाँ को आते तो हमेशा की तरह अपने दैनिक उपयोग की सामग्रियों व पहनावे वाले वस्त्रों की खरीददारी पूर्णियाँ भट्टा बाजार से ही किया करते थे.. तो फिर पूर्णियाँ के इस जाग्रत स्तंभ सपूत को बदलते कालखंड में इतनी आसानी से कैसे भुलाया जा सकता है।



सतीनाथ भादुड़ी की विश्व प्रसिद्ध "जागरी" का बांग्ला भाषा से अंग्रेजी भाषा में रुपांतरण "द विजील" के रुप में सुप्रसिद्ध लेखिका सुश्री लीला रे द्वारा किया गया है, जिसे यूनेस्कों ने भारतीय साहित्य की अनमोल निधि के रुप में कुछ चुनिंदा कृतियों के साथ संरक्षित कर हम सभी भारतवासियों का मान बढाने का एक सक्षम कार्य किया तो है ..लेकिन जैसे सतीनाथ भादुड़ी का नाम अपने ही कर्मस्थल पूर्णियाँ बिहार में साहित्यिक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो गया। बात वर्ष २००९ में पूर्णियाँ स्थित कलाभवन में दैनिक जागरण समाचारपत्र के सौजन्य से आयोजित हास्य कवि सम्मेलन की है। देश भर से आऐ नामी गिरामी हास्य कवियों का जमावड़ा लगा था और फिर कार्यक्रम के आरंभिक संबोधनों में पूर्णियाँ व सीमांचल क्षेत्र से जुड़े लेखकों, कवियों व साहित्यकारों का नाम एक एक कर पढा जाने लगा। मंच से पूर्णियाँ के सभी कवियों लेखकों व साहित्यकारों के नामों में एक नाम जो नहीं लिया गया वो नाम सतीनाथ भादुड़ी का था.. मैने झट से एक कागज के टुकड़े पे अपने साहित्यिक चित्रगुप्त सतीनाथ भादुड़ी का नाम लिखकर आगे मंच की ओर बढाया और फिर कार्यक्रम के बीच में उनका नाम भी सुन पाया।

जागते रहो.. और जग को जगाते रहो..!!!

Vinayak Ranjan

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मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना..

 मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना..

  जैसे उन सारे शब्द संगीतों ने मेरे आस-पास ही अपना डेरा डाल दिया हो। फिर अपने पूर्णियाँ कटिहार भागलपुर से सटे परिदृश्य भू-भागों ने तो जैसे इसे पुनर्जीवित व सहेजे रखने का भरसक प्रयास भी किया.. और मैं एक जीवन साक्ष्य की तरह एक नए पात्र को निभाता चलता गया। कटिहार के अपने नानी घर बिजैली जाने के क्रम में, वो टप्पर वाले बैलगाड़ी तो कभी तांगा गाड़ी का कभी पथरिले तो कभी धुल मिट्टी व कादो किचड़ वाले रास्ते से होते हुए अपने पास आते नानी गाँव को देखने की उत्सुकता कुछ कम न थी। बंगाल से सटे इस बांग्ला भाषाई परिक्षेत्रों में एक पारिस्कृत संस्कारों का वास था, जो महानगरों के दंशकोषों से खुद को बचाऐ रखने की अपने गर्भीय जद्दोजहद में रची सनी मूर्धन्य मदमाती सी निश्छल.. और फिर "डोली में बिठाई के कहार" वाला धुन। शायद ग्राम्य भाव से निकलते इन्हीं धुनों को संजोने कभी "पाथेर पांचाली" के लेखक विभूति भूषण बंदोपाध्याय तो कभी "ढोढाय चरितमानस" के लेखक सतीनाथ भादुड़ी इन जीवन मर्मों की ओर रुख लिया करते। इन भावों में पालकी में बैठी अपने पिया घर को जाती बालिका वधु की प्यारी से एक झलक मिल जाती तो.. पालकी अपने कंधों पे उठाये सामंती शासनों के अधीन पसीने से तरबतर कहारों के संसर्ग भी जीवन साध्य को कुछ ढोते तो कुछ जीते चले जाते.. और फिर पीछे छुटती दिखती अपने सपनें को संजोऐ ग्राम्य अमृता एक बंदिनी भी।

हाँ.. फिर बंदिनी से याद आया.. कथा शिल्प बिमल रॉय का अमर प्रेम भी। अपनी फिल्म बंदिनी के कुछ अमर चित्रों को भी तो उन्होंने इसी परिदृश्यों में गुथा था। कटिहार से सटे मनिहारी गंगा घाट पे स्टीम इंजन वाली ट्रेन की बॉगी से उतर घाट से सटे नदी वाले स्टीमर की ओर भागती कर्तव्य परायण बंदिनी। ब्लैक एंड व्हाइट कैन्वास पे अपने रंगीन यौवन को निढाल कर अपने परिणीत के गले जा लिपटती है.. और एक परिणीता बन जाती है। इन जीवंत आत्मोत्सर्गों को महान संगीतकार एस. डी. बर्मन साहब के बनाए धुनों औऱ कुछ गाए गीतों ने जैसा फ्रेम किया.. तो फिर इस लाईफ टाईम फ्रेमिंग से निजात पाना मुश्किल ही है। इनके गीतों का ताना-बाना बिल्कुल मेरे जगह की गंगा, कोशी व महानंदा नदियों के धारों के आस-पास ही बसी-बसाई सी लगती है.. जैसे इस परिदृश्यों से इनका कोई जन्म जन्मांतर का संबंध हो। सचिन देव बर्मन की अमर आवाज में बंदिनी फिल्म का ये गाना - "ओ रे माँझी... मेरे साजन हैं उस पार..." फिर.. "मन की किताब से तुम.. मेरा नाम ही मिटा देना.." कभी मिटाए नहीं जा सकते ...."।

 सचिन देव बर्मन को अगर भारतीय सिनेमैटिक संगीत का एक दुर्लभ महापात्र कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी...
#sdburman #sachindevburman

 


मन की किताब से तू, मेरा नाम ही मिटा देना
गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना
मुझे आज की बिदा का मर के भी रहता इंतज़ार
मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार
ओ मेरे माझी, अबकी बार, ले चल पार, ले चल पार
~
मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की चिर संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल मन मीत तेरी हर पुकार
मेरे साजन हैं उस पार..
~
फ़िल्म: बंदिनी / Bandini (1963)
गायक: एस. डी. बर्मन
संगीतकार: एस. डी. बर्मन
गीतकार: शैलेंद्र
अदाकार: अशोक कुमार, नूतन

 #MereSajanHainUssPar #Shailendra #AshokKumar #Nutan #Dharmendra #Bandini  #bollywood #Manihari #Katihar

Sunday, 16 September 2018

संवेदनाओं के सफर में..

संवेदनाओं के सफर में..
 
  माथे पे खिंची मखमली सिलवटों व हाथों पे उभरती धमनियों की रंगरेजी कमानों से निकली नक्काशी.. उम्र के इस पड़ाव पे तो आँखों के साथ काँपते बढते कदम भी माथे का जोर कम कर जाते हैं। जीवन चक्र के अंतिम पन्ने एक एक कर जैसे ये बताने को काफी हैं कि कितने मुस्तैदी से इन्होंने शब्द श्रृंखलाओं को अपने अनुभवों में वर्षों कसे रखा। आज शाम आटो में बैठने के क्रम में एक ऐसे ही वृद्ध मन को पास पाया। उम्र अस्सी पार की होगी.. चेहरे पे वक्त की कारुण्यता.. पर जैसे लड़खड़ाते कदमों में आज भी कुछ मंजीलें तय कर लेने की जद्दोजहद। आटो की पीछे की चार सीटों पे तीन महिलाऐं अपनी रोजमर्रा की समानों को खरीद बैठी हुई। आराम के तौर पर उन भरी सीटों पे चौथी सीट को तलाशना आम न था.. और तो और जब बेपरवाह निगाहें एक जगह देने को भी राजी नहीं। समय देख मै ड्राईवर की बगल वाली सीट से उतर उस वृद्ध बाबा की हाथ पकड़ी और बैठी महिलाओं को समझाया कि सीटें तो चार जनों की है ना और उन वृद्ध हाथों को सहारा दे अंदर बैठने में उनकी मदद की। अंदर बैठी मान्य महिलाओं को तो एक पल साफ लगा होगा कि कहीं मै इनके साथ तो नहीं.. उन सभों के झल्लाऐ मिजाज से तो कुछ ऐसा ही लग रहा था। चलती आटो में बाबा ने एक जगह कुछ अचरज भरी नजरों से गाड़ी रोकने को कहा.. जैसे उनके गंतव्य स्थान को लेकर उनकी बूढी आँखें कुछ धोखा खा रही हों। फिर एक गली के पास इशारा कर वो उतर तो गए.. लेकिन पास जेब में रखे १०-२० के नोटों की पहचान में ही खुद उलझ कर रह गए.. जैसे मंद पड़ी आँखों ने बाजारु रौशनियों में एक बार फिर धोखा देना शुरू किया हो। मैने फिर पहल की और बाबा को कहा कि.. अब आप रहने दिजिऐ ५ रुपए मैं आटो वाले को दे दूंगा। अब मैं इत्मिनान सा था.. बूढे बाबा भी दूर जाते रहे.. अपनी अनुभवों को थोड़ा इजाफा किऐ अब मैं अपने गंतव्य को उतरने को था ही कि एक झल्लाया स्वर पीछे की सीटों से जो आया कि " बिना पूछे ऐसे लोगों को क्यों बिठा लेते हो.. खाम खा समय जायर करवा दिया।"

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भागलपुर: अंगदेश से अंकोरवाट..

भागलपुर: अंगदेश से अंकोरवाट..

    मैं #भागलपुर बोल रहा हूं। आपका अपना शहर भागलपुर। गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है। लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि आपका शहर दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है। एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं। महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही।

वस्त्रों में सबसे अनुपम #रेशम के उत्पादन के लिये मेरा नाम चांदो सौदागर के जमाने से पूरी दुनिया में फैला है और उसी के साथ फैली है #विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ख्याति, #कर्ण की दानवीरता की कहानियां, जदार्लू आम और कतरनी चावल की खुशबू, जैन तीर्थंकर वासुपूज्य की ख्याति, महर्षि मेहीं का अध्यात्म और ऐसी ही सैकड़ों चीजें। हजारों साल का बूढ़ा मैं भागलपुर आज अपनी कहानी लेकर आपके सामने हाजिर हूं।

पुण्य देश के राजा थे #भागदत्त, जिन्होंने मुझे अपना नाम दिया. पहले मुझे भागदत्तपुर पुकारा जाता था। बाद में लोगों के लाड-प्यार से बिगड़कर यह भागलपुर हो गया। पहले मेरा अस्तित्व एक उपनगर के रूप में था जो अंगदेश की राजधानी चंपा से सटा था। समय का फेर देखिये अब चंपा ही उपनगर बनकर चंपानगर हो गयी है और मैं भागलपुर ही नगर का मुख्यकेंद्र बन चुका हूं। चंपा का नाम अंग राज चंप के नाम पर उनके पिता ने रखा था, पहले उस नगरी का नाम मालिनी था। फूल से दो नामों वाले उस शहर की भी क्या रौनक थी। जहां राजा बलि के सबसे बड़े पुत्र अंग का राज्य चलता था, जिन्हें पृथ्वीपति की उपाधि मिली थी, उसी वंश में आगे चलकर चित्ररथ नामक न्यायप्रिय सम्राट हुए जिनके राज्य में लक्ष्मी और सरस्वती अपनी श्रेष्ठता का फैसला कराने पहुंची थीं।

राजा रोमपाद जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे और उनका एक नाम भी दशरथ ही था। अयोध्या नरेश दशरथ की पुत्री शांता रोमपाद के ही महल में उनकी दत्तक पुत्री के रूप में रहती थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ और उसी श्रृंगी ऋषि द्वारा कराये गये अनुष्ठान से दशरथ को राम जैसे पुत्र मिले। राजा कर्ण की वीरता और दानशीलता की कहानी जगजाहिर है। वे इसी चंपा शहर में वास करते थे, उनका महल कर्णगढ़ कहलाता था। जहां आजकल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी संचालित हो रही है। उनका विवाह भागदत्त की एक पुत्री से हुआ था, जबकि दूसरी पुत्री का विवाह उनके मित्र दुर्योधन से हुआ था।

फिर इस शहर पर जगतप्रसिद्ध चांदो सौदागर का राज हुआ,  जिसकी बहू बिहुला ने अपने तप से अपने मृत पति और पांच जेठों को फिर से जिलाने में सफलता प्राप्त की और मनसा पूजा की शुरुआत की। अविश्वसनीय सी लगने वाली ये तमाम कहानियां पुराण के पन्नों में दर्ज हैं और यह भी कि #कंबोडिया कभी भागलपुर का सांस्कृतिक उपनिवेश हुआ करता था और वहां का #अंकोरवाट मंदिर वस्तुत: अंगकोरवाट मंदिर है. हालांकि इस तथ्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सहमत नजर आते हैं और राष्ट्र कवि दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में भी इस तथ्य का उल्लेख किया है।

बहरहाल इसके बाद की ऐतिहासिक कथा भी कम गौरवशाली नहीं। खास तौर पर पाल राजाओं का जमाना, जब मेरे शहर के पड़ोस में एक गांव अंतीचक में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जिसे विक्रमशिला महाविहार का नाम दिया गया। उस तंत्र शिक्षण केंद्र में दुनिया भर से छात्र आते थे। इसी विश्वविद्यालय का कमाल था कि मेरे इलाके से आर्यभट्ट और अतिश दीपंकर जैसे विद्वान पैदा हुए। आर्यभट्ट की कीर्ति तो दुनिया जानती ही है पर सबौर वासी अतिश दीपंकर का योगदान भी कम नहीं है, जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लामा संप्रदाय की शुरुआत की। बहरहाल काल के कपाल में चंपा, मालिनी, कर्णगढ़ तो समा ही गये और विक्रमशिला महाविहार भी जमींदोज हो गया और उसके साथ ही मिटने लगी यहां पैदा हुई तंत्र साधना व सिद्ध और नाथ संप्रदाय की परंपराएं। पहले अंग देश मगध का हिस्सा बना फिर बंगाल का. बंगाल से पाल और सेन वंश मिटे और तुर्क-अफगानों और मुगलों का शासन हुआ। फिर अंग देश से राज्य और राज्य से क्षेत्र बनकर रह गया। सम्राट मिटे, राजा आये और राजा मिटे तो शासक और फिर महज जमींदार। मगर इसके बावजूद इस क्षेत्र की महत्ता कभी कम नहीं हुई। यह उसी दौर की बात है जब शहर का केंद्र चंपानगर और नाथनगर से हटकर भागलपुर में मेरे आगोश में समाने लगा था।

पाल वंश के बाद सेन वंश के राजाओं ने बंगाल पर शासन करना शुरू किया, मगर उसका एक राजा लक्ष्मण सेन इतना कायर निकला कि वह मोहम्मद गोरी को आता देख गद्दी छोड़ भाग खड़ा हुआ। इस तरह बंग के अधीन अंग के इलाकों तुर्क-अफगानों और फिर मुगलों का आधिपत्य कायम हुआ। इसके बाद मेरे इलाकों में रोशन खयाल और कला प्रेमी मुसलमानों की आबादी ने ठिकाना बनाना शुरू किया। मेरे इन बाशिंदों ने पूरे शहर में जगह-जगह इमारतें, मसजिदें और मकबरे खड़े किये जो आज भी मेरी धरोहरों की श्रृंखला में चार चांद लगाते हैं. उनकी हुनरमंदी इमारतों के कंगूरों से उतर कर रेशम के डिजाइनों तक में जा पहुंची। इसकी जौहर का नमूना था कि लोग मुझे सिल्क सिटी या रेशम नगरी कह कर पुकारने लगे हैं। फिर शायरी के तरानों का क्या कहना कि बीड़ी बनाने वाला एक मजदूर कौस भी अपने शेरों से मीर और मोमिन को टक्कर देता रहा। वैसे तो मोहम्मद गोरी के आगमन से लेकर मीर कासिम के पतन तक इस शहर पर मुसलमानों की ही हुकूमत चली पर कई दौर ऐसे आये जब यह दिल्ली की सल्तनत से आजाद अस्तित्व बनाने में सफल रही। यही वजह है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक उठा पटक में मात खाने वाले कई शहजादे गुप्त रूप से भागलपुर में अपना ठिकाना बनाकर रहने लगे। शहर के लोग कई गुमनाम मकबरों के बारे में बताते हैं कि फलां मुहम्मद शाह का मकबरा है तो फलां अहमद शाह का। इसके अलावा कई पीर-फकीरों ने भी मुझे अपना आशियाना बनाये. इनमें से कइयों के मजार आज भी कायम हैं।

कई लोगों का यह भी मानना है कि मेरा नाम भागलपुर इसलिये पड़ा क्योंकि यहां दूसरे इलाकों से भागकर आये लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है। यह भाग कर आये लोगों की नगरी है इसलिये भागलपुर है। पता नहीं भागदत्त वाली कथा सही है या यह, मगर इस बात में सच्चाई जरूर है कि मेरे शहर के आगोश में कई दूर दराज के वाशिंदों ने पनाह ली है। चाहे वह सरयूपारी ब्राह्मण हों या बंग भाषी या दरभंगा-मधुबनी के मैथिल या राजस्थान से पहुंचे माड़वाड़ी समुदाय के लोग। पता नहीं मेरी आबोहवा में क्या आकर्षण था कि इन सारे लोगों ने रहने के लिये मुझे ही चुना। मगर मेरे मिजाज को तय करने में इन लोगों का बड़ा योगदान है, खास तौर पर बंग भाषियों का जिन्होंने इस शहर के लोगों को कविता-कहानी लिखने और जात्रा-नाटक करने का चस्का लगाया। मेरे शहर में बसे मुहल्ले आदमपुर की गलियों में मशहूर कथाकार को #देवदास उपन्यास की कथा मिली तो टील्हा कोठी के एकांत में #गीतांजलि की कड़ियों ने आकार लिया। यह उन्हीं लोगों की रोशन खयाली का नतीजा था कि इस शहर की एक बेटी कादंबिनी गांगुली को ग्रेजुएट होने वाली देश की पहली महिला बनने का सौभाग्य हासिल हुआ और अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे जमींदार खानदान के नवासे फिल्मी दुनिया के सतरंगी परदे पर अपनी हुकूमत कायम करने में कामयाब रहे। प्रीतीश नंदी ने साहित्य और मनोरंजन की दुनिया को एक नई पहचान दी।

इसी आजाद ख्याली का नतीजा था कि यह शहर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत में भी अगुआ साबित हुआ। पहाड़िया विद्रोही तिलकामांझी ने जब विद्रोह की लौ सुलगाई थी तब दुनिया अंग्रेजी जुल्म की हकीकत का आंकलन भी नहीं कर पाये थे। गांधी जी के सत्याग्रह के मौके पर शहर में आंदोलनकारियों का हुजूम उमड़ता था। 1934 में जब मुंगेर में भीषण भूकंप आया और जबरदस्त तबाही मची तो इन्हीं सेनानियों ने बाना बदला और रिलीफ के काम में जुट गये। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगह प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी फौज की गोलियों का सामना बहादुरी के साथ किया। देश आजाद हुआ तो नेहरूजी प्रधानमंत्री बने. इसके बाद वे जब पहली बार भागलपुर आये तो लोगों ने सैंडिस कंपाउंड में चांदी कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी। मगर उस जननायक ने चांदी की कुर्सी यह कहते हुए फेंक दी कि जनता जमीन पर और नेता सिंहासन पर यह नहीं चलेगा।

आजादी की लड़ाई में इस शहर ने जितनी कुर्बानियां दीं आजादी के बाद उसका हासिल हमारे हिस्से में बहुत कम आया। शहर धीरे-धीरे ढहता रहा और लोगों में निराशा बढ़ती रही। उस निराशा का विस्फोट तब हुआ जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। एक बार फिर मैं व्यवस्था की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वालों का केंद्र बन गया। भागलपुर जेल में ही उस दौरान इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले बंदियों को रखा गया था और जेल की चाहरदीवारी के अंदर से विरोध के स्वर फूटते रहे। कुछ ही सालों बाद शहर में ऐसी वारदातें हुईं जो आज भी मेरे चरित्र पर बदनुमा दाग बनकर कायम है। अपराध नियंत्रण में नाकामयाब होकर पुलिस कर्मियों ने 33 युवकों की आंखों में तेजाब डाल दिया। खुद फैसला करने की इस पुलिसिया मनोवृत्ति ने एक गलत काम के कारण पूरी दुनिया में मुझे चर्चा का केंद्र बना दिया। दस साल बाद फिर पुलिसिया करतूत के कारण शहर की फिजा बिगड़ी और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये। पहली घटना ने तो शहर के चरित्र का हनन किया था दूसरी ने शहर की आबोहवा में जहर घोल दिया। इस कारोबारी शहर के कारोबारी रिश्ते तक गड़बड़ाने लगे। खैर यह बुनकर-व्यवसायी का ही रिश्ता था कि शहर के अमन-चैन को पटरी पर आ गया।

खैर उसके बाद से शहर का अमन-चैन बरकरार है। लोग जात-धर्म के बदले कारोबार की बातें करते हैं। सन 2001 में विक्रमशिला सेतु बना तो उत्तर बिहार के कई जिले भागलपुर के संपर्क में आ गये। इसके बाद यहां के कारोबार ने तो जैसे उड़ान पकड़ लिया। डल चादर के लिये मशहूर यह शहर तो पहले डल स्वभाव का था अब महानगरों की तेज रफ्तार जिंदगी से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है। धड़ाधड़ अपार्टमेंट बन रहे हैं, शोरूम खुल रहे हैं। लक्ज़री कारों से शहर की सड़कें अटी रहती हैं. लड़के-लड़कियां बाहों में बाहें डाले ऐसे घूमते हैं जैसे कि हम दिल्ली-कोलकाता आ गये हों। रेस्तरां की सीटें फुल रहती हैं, बच्चे फटाफटा अंग्रेजी बोलते हैं और जवान होते-होते किसी कंपनी के बड़े अधिकारी बन जाते हैं। इसके बावजूद शहर के शोर में अंगिका की खनक कायम है। बिहुला विषहरी के बोल अब भी गूंजते हैं, गंगा घाटों पर अब भी स्नानार्थियों का मेला लगता है। कतरनी की खुशबू और जरदालू आम की गमक अब भी सैलानियों को मेरे पास खींच लाती है। मैं आज भी आपका ही शहर हूं, वही भागलपुर।

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