Friday, 27 September 2013

" दूरियों को मत बांधो, उसे तय होने दो...!!! "


"दूरियों को मत बांधो, उसे तय होने दो, जीवन सत्य को पा जाओगे, जब सूक्ष्म दिख जाएगा।" 

पता नहीं क्यों.. मन ही मन ये विचार कुछ कौंधते से दिखे। बात उन दिनों की है जब मैं अपने शहर पूर्णियाँ से किशनगंज हर दिन आना कर रहा था। एक नया इंजिनियरिंग कॉलेज खुला था वहाँ। पर कभी कभी ऐसा होता की कॉलेज के कुछ काम से जल्द ही वापस किशनगंज से पूर्णियाँ आना पड़ता। ऐसा ही था उस दिन भी, पर जैसे ही मैं किशनगंज वाले कॉलेज से पूर्णिया के लिए निकला कि पता नहीं कहाँ से घनघोर तेज बारिश होने लगी। कहा गया ज़रूरी कागजात हैं ज़रा संभाल कर लेते जाइएएगा। कॉलेज वाली जगह से किशनगंज बस स्टैंड तक आते आते तो मेरा पूरा शरीर भींग गया था, और फिर सवारी बस से पूर्णियाँ तक डेढ़ दो घंटे का सफ़र। चलती बस में कपड़े भी थोड़े सूखते दिखे और फिर बस जैसे ही पूर्णिया बस स्टैंड को रुकी की फिर से मूसलाधार बारिश का सामना यहाँ भी। कागज़ातों को जल्दी पहुँचाना है सोचकर बस स्टैंड पर रखी अपनी पुरानी स्कूटर से बाहर होती उस घनघोर बारिश में भींगते भागते पूर्णियाँ रामबाग वाले हेड अॉफिस को आ पहुँचा, कागजात दिए और फिर तुरंत घर की ओर निकल पड़ा। 

ये सबकुछ बिल्कुल ही असहज सा था.. इतनी देर भींगते हुए लगा जैसे मेरी तबीयत भी साथ से जाती दिखी, तो मैं स्कूटर मेन रुट से अलग डी एम/एस पी आवास वाले सेफ रूट.. अमूमन कम भीड़ भाड़ वाले उर्स लाईन कॉन्वेंट स्कूल के रास्ते होकर आने लगा, की चलो भीड़ भाड़ वाली ट्रैफिट से तो सामना नहीं होगा। घर आ ही रहा था की ठीक रंगभूमि मैदान से आगे थाना चौक के पहले गांधी नगर वाले बड़े-बड़े पेड़ों से लदे हरे भरे भींगते परिदृश्य में सामने से किसी पूर्व परिचित का आना जान पड़ा। हाथ में छाता थामे, मलिन मुख, मंद चाल और स्वेत वस्त्र धारण। तबतक तो मैं उन्हे क्रॉस कर आगे भी निकल गया पर एकाएक बीते वर्षो की उन यादों से मूँह मोड़ ना सका। तत्क्षण मैनें अपनी स्कूटर घुमाई और उनके पास आ पहुँचा, जैसे वो मुझे देखते ही रुक से गये थे। 

मैने कहा- "फूफा  यहाँ देख रहा हूँ, की बात.!" 

"दादी ते नेय रहले.." उन्होने कहा।

 उनके कहे ये शब्द जैसे सूक्ष्म को दर्शा रहे थे; और जैसे मेरी पूरी थकान भी जाती रही। जैसे लगा वो अपना भाग लेने ही मुझे इस रास्ते से लाई हो। मेरी दादी से बहूत बनती थी उनकी.. मेरी दादी श्रद्धा से उन्हें माँ बुलाती और वो मेरी दादी को बेटी कहती। जब तक मेरी दादी जीवित रही वर्षों का साथ नीभता गया। कुछ दिन पहले ही उस ब्राह्मण परिवार को कुछ कारण वश अपना सब कुछ छोड़ रंगभूमि मैदान के बगल में शरण लेना पड़ा था। मुझे आज भी याद है जब बचपन में मेरी दादी मुझे उनके फूंस के घर लेते जाती, तो जैसे मुझे लगता मैं शबरी आश्रम में आ गया हूँ। अब वो सारे भाव मृत प्राय से थे। मेरे पास देने को कुछ नहीं थे, पर इसके बावजूद मेरे पास जो कुछ भी था.. मैं फूफा के हाथों में रख पाया ये जान कर..........

~ विनायक रंजन


Thursday, 26 September 2013

"आज फिर मंन चला बक्सर की ओर....!!!"


एक बार फिर मौसम ने फिर अपनी पुरानी तान छेड़ी है| पिछले साल भी कुछ ऐसा ही था, जब मैं बक्सर के एक इंजिनियरिंग कॉलेज को जाय्न किया था| याद है जब पहली बार इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था| सुबह के ७/२० में एक पस्संजेर ट्रेन मिली थी दानापुर स्टेशन से, टिकेट मूल्य बस १० रुपये और सफ़र लगभग १०० किं.मी. का| जिस स्टेशन पे उतरना था, वो भी कुछ ज़्यादा ही इंग्लीश सा था... नाम था ट्रूलिगंज... किसी इंग्लीशमॅन के नाम पे था| इस नामकरण का भी अपना एक इतिहास है| मेरे इंजिनियरिंग यात्रा के रिसर्च एंड डेवेलपमेंट की यह तीसरी सीढ़ी थी मानो... ठीक बिल्कुल राज कपूर की तीसरी कसम की तरह या शम्मी कपूर की तीसरी मंज़िल की तरह.... इनोसेन्स एंड सस्पेनस से भरपूर..| ट्रेन से आते वक़्त ही लगा मानो मुझे कोई अदृश्या शक्ति खिच रही है| आज का विकाश भी मानो यहाँ आने के लिए शीशक रहा हो| प्रकृति आज भी पुरानी चादर लपेटे हुई सी थी| ट्रेन बिहटआ कोईल्वर आरा होते हुए आगे की ओर बढ़ रही थी और मुझे मेरे मंज़िल को पाने की ललक अपने चरम पे थी| फिर कुछ छोटे स्टेशन को क्रॉस करते हुए ट्रेन ट्रूलिगंज जा पहुँची| स्टेशन छोटा था लेकिन लगा जैसे आधी ट्रेन खाली हो गयी उस जगह| फिर एक जीप में बैठ मैं उस इंजिनियरिंग कॉलेज की ओर जाने लगा| स्टेशन से वो जगह कुछ ४-५ कि. मी. का रहा होगा| लेकिन इसी दूरी ने मुझमें जो छाप छोड़ी.. उससे शायद ही मैं कभी मुक्ति ले पाऊँ| पूरी तरह से ग्राम्य-जीवन से भरपूर, और डेग डेग पे ब्रम्‍ह-स्थलों का मिलना... जैसे ना जाने कब से ये दुस्साहसी ब्रम्हचर्यों के आहमन को आतुर रही हो| ब्रम्‍ह-स्थलों की महिमा मैं कुछ चंद पंक्तियों में नहीं कर सकता|
फिर इंजिनियरिंग कॉलेज पहुँचने पे बहूत कुछ अद्भूत ही था| डेवेलपमेंट के आज के युग में आप सोच ही नहीं सकते की... कोई इंजिनियरिंग कॉलेज खोलने का दुस्साहस भी करेगा ऐसे वीरान जंगलों के बीच...| फिर मेरा सामना हुआ... वहाँ के डाइरेक्टर से जो भारत सरकार के डी. आर. डी. ओ. में चीफ साइंटिस्ट पद पे कार्यरत थे| मेरे प्रोफाइल को देख उन्होने सहसा कह डाला की आप ऐसे जगह की तलाश कर रहे थे... उन्हें मेरे रेज़्यूमे में अंडर-प्रीविलेदगेड वर्ड बहुत पसंद आया था| इंटरव्यू के बाद मैने एक क्लास भी ली... बड़ा ही सुखद अनुभव था ये.....

विप्र प्रयाग घोष



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" क्यों ना फिर चलें प्रेमचंद- शरतचंद्र की ओर...!!! "


आज भी वो बचपन की कहानियाँ जो कभी दादा-दादी से सूनी तो कभी अमर-चित्र कथा कॉमिक्सों में पढ़ी या फिर दूरदर्शन के विक्रम वेताल या सिंहासन बत्तीसी में देखी सहसा आपको उस लोक में लेते जाती हैं जिसे बस आप और हम अपनी कल्पनाशीलता से ही अनुभव कर आनंदित हो उठते हैं| फिर आप खुद को अपने समाज, देश और कालों में पिरोते हुए जीवन-सूत्रों को ढूँढने का प्रयास ही करते हैं, और यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है| फिर हम और हमारी मर्यादायें किसका अनुशीलन करती हैं... कहते हैं आप जिस घड़े में रहोगे उसी तरह बनॉगे या फिर अपने कार्यानुभव से खुद को बदलने या मॉडरेट करने की कोशिश भर...| जिस हिन्दी एडिटर के साथ आपके समक्ष हूँ यह पहले मिला ना था, और अब मिला है तो जैसे कुछ लिखने का सूखापन, अब बारिश की फुहारों से इसे भींगा सा रहा है| वास्तव में हम आज भी गाँव के ही हैं... बिल्कुल ही बेफ़िक्र... अंजान की बारिश होगी या नहीं.... भगवान भरोसे.. लगभग सभों के साथ कुछ ऐसा ही... इसलिए तो भगवान आज भी हैं| याद है जब दादाजी के साथ अपने गाँव जया करता था, और जहाँ बस रुकती थी वहाँ से मेरा गाँव कुछ ३-४ किंमी की दूरी पे था| बस या तो ज़मीनो के मेड या फिर उबर खाबर पगडंडिया गाँव पहुँचने के लिए| अपने घर पहुँचते पहुँचते पैरों में दर्द हो जाता, तो दादाजी से कहता यहाँ रिक्शा वग़ैरह नहीं मिलता है... वो कहते ठीक है तो आ जाओ मेरे कंधे पे बैठ जाओ... यह सुन फिर मैं पैदल चलने लगता | फिर याद है... एक बार गाँव से वापसी के समय दादाजी ने कहा चलो गिनती करो तो यहाँ से वो जगह जहाँ बस मिलेगी कितने डेग में आता है.... फिर क्या था मेरी गिनती स्टार्ट हो गई... फिर चलते चलते वो जगह आ गयी जहाँ बस आके रुकती थी... फिर हम बस में भी बैठे... ददाही ने कहा कितना डेग हुआ यहाँ तक... मैने जवाब भी दिया... उन्होने फिर पूछा पैरों में अब दर्द हो रहा है... मेरे पास बस मुस्कुराहट थी| प्रेमचंद ने भी सयद ऐसा ही कुछ किया अपनी लेखनी में... जो देखा वो लेखन में बोया, पिरोया और डुबोया| जीवन संघर्ष ही आपको अभिव्यक्ति की शक्ति दे पता है.. और मुक्ति भी...| एक बार अपने भागलपुर यात्रा में कुछ वर्ष पहले ही, एक पत्रकार के मेरी मुलाक़ात हुई... उनसे मैं शरतचंद्र के बारे में कुछ जानना चाहा क्योंकि उनकी लिखित देवदास उनकी भागलपुर और उनकी खुद की रियल स्टोरी पे ही आधारित है, जिसका ज़िकरा विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा से भी मिलता है.| तो यह जानकर मैं दंग रह गया जब पता चला की रबींद्रनाथ टैगोर खुद साहित्य-स्पर्धा के द्वेष में उनके विषय में जानने को ही भागलपुर आए थे, और वहीं भागलपुर यूनिवर्सिटी की टिल्ला पहाड़ी पे ही रहकर नोबेल पुरस्कार वीदित गीतांजलि की प्रथम रचना किए थे| शरतचंद्र के पूर्व जीवन को उन्होने इतना खनगाला की शरतचंद्र को कलकत्ता छोड़ बर्मा जाना पड़ा... और वहीं रहकर शरतचंद्र को अपनी कालजयी रचनाओं को प्रकाशित करना पड़ा|

तो फिर क्यों ना चलें प्रेमचंद... शरतचंद्र की ओर....

~ विनायक रंजन




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Monday, 9 September 2013

"महासभाओं के होड़ में आदर्श शिक्षकों का भिक्षाटन...."

   बात उन दिनों की है, जब हम मैट्रिक रिजल्ट के बाद तब बिहार के नामी कॉलेजों में एड्मिशन के लिए पटना और भागलपुर के चक्कर लगा रहे थे। तब पटना और भागलपुर के कुछ चुनिंदा कॉलेज में पटना साइन्स कॉलेज, बी. एन. कॉलेज, ए. एन. कॉलेज एवं टी.एन.बी. कॉलेज का चुनाव और फिर इन कॉलेजों में एड्मिशन हो जाना बिहार के लगभग सभी मैट्रिक पास छात्र-छात्राओं का सपना हुआ करता था। तब पटना भ्रमण के दौरान मैने महसूस किया था कि आने वाले दिनों में जिस साईन्स और मैथेमैटिक्स की किताबों से हम मुखातिब होने वाले हैं.. उनके राईटर्स की यहाँ कोचिंग क्लासेस चला करती है। पटना के उस दौर के कुछ नामी गिरामी शिक्षकों में बिल्टु सिंह, नफीस हैदर, अख़्तर साहब, के.सी. सिन्हा भाईयों के नाम प्रमुख थे।

    ..फिर कुछ दिनो बाद अपना अड्मिशन पूर्णिया कॉलेज पूर्णिया में ही संभव हो पाया। स्कूल छूटते ही मानों एक खुला व उन्मुक्त नवीन पाठशाला.. फिर तो पूर्णिया कॉलेज का भी अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। कॉलेज प्रक्रिया में आने के कुछ दिनों बाद पूर्णियाँ के ही एक साईंस कोचिंग क्लास के साथ विषयवार होम टेबल ट्यूशन को भी जाय्न किया था, जिनमें कुछ शिक्षक प्रोफेसर तो पूर्णिया कॉलेज में भी पढ़ाते थे। जिनमें केमिस्ट्री के प्रख्यात प्रोफेसर डा. टी.वी.आर.के. राव, यू.एम.ठाकुर.. फिज़िक्स में टी.के. डे, एस. पी. यादव, ए.के. पाण्डेय.. मैथेमैटिक्स में रवि मुखर्जी, महादेव चौधरी, अमल घोष, विजय तिवारी, सुभाष बाबू आदि उस समय के फेमस शिक्षकों में मान्य थे। बॉटेनी ज़ूलोजी में भी प्रोफेसर एस.के.राकेश, बी.एन. पाण्डेय, अजय सिंह व अन्य अच्छे फेमस प्रोफेसर थे। 

...फिर तो जैसे मौजूदा प्राईवेटाईजेशन दौर में कुछ ब्रांड महासभाओं के शिक्षाटन में इन शिक्षकों की निजी प्रतिभाओं को मानो ग्रहण सा लग गया। जो शिक्षक तब के उभरते नए शैक्षणिक ब्रांड व्यापार में अपने निजी शिष्टाचार को पिरों पाए, उनकी राह लग गयी.. लेकिन कुछ को पलायन का मार्ग भी अपनाना पड़ा। खुद मैं जब अपने वर्ष २००४ के उत्तरार्ध अपने दस बारह वर्षों के इंजीनियरिंग कॉलेज अध्यापन अनुभव को देखता हूँ तो जैसे समकक्षीय आवरणों में अनुकरणीय व अनुशासित शिक्षकों की कमी बहुत ज्यादा ही महसूस हुई। जो शिक्षक समाज में बचे थे, मानों उनकी बोलती नए नवेले शैक्षणिक ब्रांड व्यापार समीकरणों में सुशुप्त सी पड़ी थी। अमूमन आज जागरण देने वाला मानों खुद ही अपना ही मुँह ताक रहा हो। महाविद्यालयों के इन गुरुजनों से लैस तात्कालिक समाज भी तब इन सामाजिक आग्नेयास्त्रों से खुद में समृद्ध समझा जा सकता था। अनुशासन की कटिबद्धता कुछ ऐसे ही प्रतिबद्ध अनुसरणों में निहित सी थी। हर एक शहर प्रोफेसर कॉलोनी के दिव्य स्थापन से ही खुद में सुशोभित था। क्या साहित्य.. क्या इतिहास और क्या दर्शन-शास्त्रों से निकल कर आंचलिक-सामाजिक रसायन में जा घुलते विज्ञान.. आज कहाँ विलुप्त हैं? 

....फलत: कुछ नाम जो रिसते दिखे थे.. आज से कुछ महिने पहले वर्ष २०१३ जून एल.एन.मिश्रा मैनेजमेंट कॉलेज मुजफ्फरपुर प्रैक्टिकल एग्जाम कंडक्शन में। पटना के रहने वाले प्रोफेसर भी तब मेरे ही साथ वहाँ बतौर एक्सटर्नल बुलाऐ गए थे। बातों बातों में जो ज्ञात हुआ.. १९९५ की फेमस 'मिश्रा एंड मिश्रा' प्रोबैबेलिटी मैथेमैटिक्स किताब उनकी ही लिखी थी.. जिसका उत्साह बोध आज के नए बाजारु दौर में काफी हद तक निष्क्रिय प्राय ही है।

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  शिक्षावादिता का वंदन तो गुरु समक्ष ही जान पड़ता है और फिर ऐसी आभाऐं जो बचपन से ही प्रमण्डलीय ऋचाओं में घुली पड़ी हों। ज्ञानसूत्र के ऐसे नव-अंकुरण जो अनेकानेक व्याधियों से परे विचरण को उन्मुक्त स्वतंत्र नित मंचन.. अभिरंजन।

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....इस कड़ी में देखें तो तमाम ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेजी शिक्षा को बल प्रदान करने की पृष्ठभूमि भी तो स्कूली दिनों के मास्टर साहब ही तैयार करते नजर आते हैं। अनुशासन व नैतिक अभिक्रियाओं की पहली वो पहली पाठशाला। सेंट पीटर्स और उर्सुलाइन कॉन्वेंट स्कूल नर्सरी और केजी क्लासरुम्स की आरंभिक शिक्षा। इस क्रम में सहस याद है देवी माँ सरस्वती के समक्ष हाथों में स्लेट और खल्ली पकड़े लिखे गए कुछ पहले साहित्यिक अक्षर.. अ.. आ.. इ.. ई.. और वो भी एक स्कूली प्रांगण में पूर्णियाँ कोशी अंचल के महान संस्कृताचार्य पंडित श्री केशवनाथ त्रिपाठी जी के समक्ष। वे भी तब पूर्णियाँ गर्ल्स हाई स्कूल में ही पदस्थापित थे और जिनका आवास पास ही मधुबनी जयप्रकाश कॉलोनी में था। रोजाना की भाँति ब्रह्म वेश में धोती कुर्ता व माथे पे तिलक मेरे घर के बगल से ही स्कूल पैदल ही जाते.. फिर तो जैसे इन प्रकांड महात्माओं की पद छाप ही कितने श्लोकों व छंदों को गढते चले जाते। उम्रदराजी होने पे भी अपने परममित्र श्री मदन सिंह से मिलने संध्या बेला में रोजाना की भांति सहस ही आते दिखते। मित्र बंधुता व संबंध प्रगाढता के कितने ही साहित्य जो उन भोजपुरी वार्तालाप के तानों बानों में बुने जा सकते हैं। सौभाग्यवश उसी गर्ल्स हाई स्कूल में मेरी माँ 'गौरी दत्ता' ने भी शिक्षा ग्रहण की और फिर रिटायरमेंट तक शिक्षिका पद पे अपने गुरुजनों के साथ ही सतत सुशोभित रहीं। संस्कृत व हिन्दी साहित्य से जुड़ी अनुभवी शिक्षिकाओं में हमारे समाज की ही धर्म प्रवृत्त व मेरे मित्र की दादी श्रीमति सुदामा मिश्रा भी थी। युं कहें तो साहित्य शास्त्रों में मैनें बस महादेवी वर्मा का नाम ही सुना था.. पर मुखमंडल ध्यान बस उनका ही आता। क्रिश्चियन व रोमन कैथोलिक मिशनों से जुड़े स्कूली पाठशालाओं में भी तब कोई भेद ना था.. वहाँ जो आपके शैक्षणिक कौशल सक्षमता का सटीक मूल्यांकन मिलता। फिर ज्ञान गर्भ के वेदकोष में कितने ही सारे गुरुजनों के नाम रह रहकर सुनने को मिला करते.. काशी बाबू.. भुवनेश्वर बाबू, भोला बाबू.. गजेन्द्र बाबू.. तिलोत्तम बाबू.. गायत्री दी.. करतार दी.. उमा वर्मा दी.. रमा लाहिड़ी दी आदि आदि जिनसे पूर्णियाँ के कितने ही अभिभावक वृंदों ने भी शिक्षा दीक्षा ग्रहण की थी। फिर पढने पढाने व गुरु निष्ठा के सम्मान व आचरणों से भरे जीवन में.. मेरी दादी माँ के एक शिक्षक श्री सुरेन्द्र नारायण सिंह पिता श्री बिरेन्द्र नारायण सिंह का आवास भी मेरे घर से महज कुछ डेग पे था।

..गौरतलब शिक्षकों के सम्मान से जुड़े आस्थावान धम्म चरित्रों में आज भी याद है जब श्री सुरेन्द्र नारायण सिंह अक्सर ही मेरी दादी का नाम "उषा" "उषा" रटते मेरे घर पे आते और हम बच्चों को ब्रिटिश हुकूमत व आजादी के दिनों की कहानियां बता जाते। मेरी दादा-दादी के विवाहोपरांत.. दादी ने स्कूल टीचर्स ट्रेनिंग उन्हीं के प्रिंंसिपलसिप में भागलपुर बाँका से किया था। दादाजी उन दिनों संभवतः वर्ष १९५५-५६ भागलपुर पुलिस अॉफिस में कार्ययरत थे और कुशलक्षेम हेतु यदा कदा दादी माँ से मिलने आते.. तो इस प्रसंग को बड़े ही जी-ठिठोली भरे लहजे में मास्टर साब हम बच्चों को अक्सर ये सुनाते कि- "तुम्हारा दादा 'रवि-तुमन' (मेरे पिताजी और चाचाजी) को अपने साथ लेकर पुलिसिया हाफ पैंट यूनिफॉर्म में आता था.. लेकिन मैं उसे घंटो बाहर खड़ा रखता था..।" इतना कहकर वे जोर से हँसने लग जाते। गाँधी टोपी, धोती, कड़क मूँछ और अपने सख्त अंदाजों में वे हम बच्चों के लिए चाचा चौधरी से कम ना थे.. और तो और उनके आगमन से सख्त मिजाजी मेरे दादा दादी भी विनम्र हो जाते। हम सब प्यार से उन्हें 'मोचू मास्टर साब' कहते। सच में जीवन के ऐसे श्रद्धेय भावों के हम कभी पार उतर ही नहीं सकते।

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥


..फिर तो बचपन के दिनों से ही अपने मुहल्ले समाज में स्थापित व सुसज्जित इन्हीं भव्यताओं में हम सभों के नए बोल भी फुटे थे। घर के सामने ही कुरसेला राज परिवार के प्रोफेसर विजय कुमार सिंह का निवास व सामने वाला खुला फिल्ड। आज भी वो प्रोफेसर साहब के नाम से ही सुशोभित है.. हम सभी बच्चों के खासे प्रिय.. प्रेम व आदर वश हम उन्हें बाबा ही बुलाया करते। उनके उस पुराने बड़े से घर आंगन में हम सभी बच्चों की खुब धमा चौकड़ी होती। लुका छिपी हो या क्रिकेट या बैडमिंटन.. हर तरह का खेल उनके ही घर आंगन। खेलकूद के गतिरोधों व मतान्तरों में उनका निर्णय ही श्रेष्ठ होता। फिर पिताजी के साथ मधुबनी वाले छोर पे केमिस्ट्री के प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा के घर बचपन में जाना होता था; तो कभी कभार मधुबनी दुर्गा स्थान के बगल वाले स्कूल में पंडित तेज नारायण राय जी के घर। आज भी पंडित जी के माथे लगा चंदन का लेप मेरे मन को शांत कर जाता है; तो पूर्णियाँ कॉलेज वर्ष १९९३-९५ दिनों में इस कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य व साहित्यकार पंडित जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज' के साथ लक्ष्मी नारायण सुधांशु आदि बड़े साहित्यिक नामों को जान पाने की असीम शांति भी। ओह! एक सभ्य व शालीन समाज के पूरक प्रोफेसर नामावली की इस गरिमा में कितने ही वरिष्ठ मनुस्वियों को हम सब ने अपने इसी समाज में देखा है.. जिनमें प्रोफेसर एन.के. सिंह, इन्दुबाला सिंह, प्रमोद कुमार सिंह, रामू बाबू, उर्मिला यादव, राजलक्ष्मी सिंह, विजया झा आदि सम्मानित नाम तो आदरणीय स्कूली शिक्षकों में महावीर बाबू, रणविजय सिंह, बिरेन्द्र सिंह, शंभु मिश्रा, कौशल बाबू आदि शिक्षकों के नाम आज भी स्मृतिपटल पे सुसज्जित हैं।

ज्ञान विज्ञान के साथ साहित्य व कला को बल देते भाव भी संजोने को मिले थे। चाहे हो अपना घर आंगन या पास ही का कला भवन। इस क्रम में प्रोफेसर अखिलेश्वर वर्मा को तो अपने घर पे ही कवि-साहित्यकार अज्ञेय जी की रचनाओं पे पी.एच.डी शोधपत्रों को घंटों लिखते देखा करता था। वे अपने कमरे में कभी लालटेन तो कभी जलती लैंप की लौ में हिन्दी साहित्य की कमर कसते.. तो यह देख मैं अक्सर विचार करता कि आखिर इन अक्षरों में क्या छिपा है; तो साथ ही दिख पड़ते मेरे दादाजी के लिखे कितने ही लेख.. जिनमें यात्रा उल्लेखों के साथ कविताऐं भी संलिप्त रहतीं। वर्ष १९८९ सिएटल अमेरिका विदेश यात्रा में तो उनकी लिखी कुछ ईंग्लिश कविताएँ भी पढने को मिली। या फिर कहें तो सामाजिक व वैश्विक जीवन के हर एक छोर पे मानों शैक्षणिक ध्रुवों का एक वृहद सार छिपा पड़ा है। फलत: पुनर्जागरण हेतु हमें अनन्य  मर्म आध्यात्म को जीवंत करना ही होगा और तो ही जीवन मूल के ऋषि योग में महर्षि, राजर्षि व ब्रह्मर्षियों के साथ कल्पांतों के सप्तर्षियों को जाना व समझा जा सकता है।

  अब तो दशक पे दशक बिते.. नयी पीढ़ी कुछ जानने को आकुल.. बताने वाला कोई नहीं। टेलिवीजन, रुपहले पर्दे और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से नयी पीढ़ी को क्या मिलने वाला, जब मानव प्रकाश पुंज बिखेरने वाला सामाजिक शिक्षित गजमुक्ता ही विलुप्त है। सटीक मार्गदर्शन के इसी आक्रांत भाव में आज के छात्र कोटा, नई दिल्ली व अन्य विकसित राज्यों के महानगरों का बेबस रुख़ कर लेते हैं। स्वयं सिद्ध महासभाओं के दंश में एक मौन प्रखर कथित शिक्षाटन को मजबूर... तो फिर उन समाज शिक्षकों का क्या जो इन ब्रांड दंश से अपने भिक्षाटन पे हैं..।

-- Vinayak Ranjan