..क्यों मिल गए ना शरतचन्द्र...!!!
बक्सर बिहार के डुमरॉव रेलवे स्टेशन पे सुबह-सुबह ट्रेन से उतरते वक्त ऐसे ही भावों से मैं घिरने लगा था। हुआ यूँ कि बक्सर के अपने इंजीनियरिंग कॉलेज को जाने के क्रम में दानापुर रेलवे स्टेशन से इलाहाबाद को जाती हावड़ा से आने वाली विभूति एक्सप्रेस को पकङ़ा। एसी बॉगी में बैठते ही कलकत्ता से आ रही एक सज्जन महिला से कुछ बांग्ला भाषा के बोल सुनाई देने लगे। वो अपने छोटे पुत्र कलकत्ता हाई-कोर्ट मे कार्यरत कुशल चटर्जी के साथ बनारस को जा रहीं थी। बातों-बातों में मेरे मूख से निकले भागलपुर शब्द ने तो जैसे हमें हमारे पूराने रिश्तों को और थोड़ा करीब ला खङा किया। सहसा उनके मुख से निकले वे शब्द " आमरा शरतचोंन्दरेर फैमिली तेके..." ही मेरे लिए सबकुछ थे मानो। फिर उस एक-सवा घंटे के सफर में भागलपुर से जुङी ढेर सारी बातें हुई..। मैं अपने सामने शरतचंद्र की तीसरी और चौथी पीढी को देख पा रहा था। ...फेसबुक की दुनियाँ भी मेरी इस साहित्यीक भावों को मरहम लगाती कुछ यूँ नजर आयी की इसी फेसबुक के माध्यम से पूर्णियॉ के जागोरी फेम्ड प्रथम रविन्द्र पुरस्कार अवार्डी साहित्यकार सतिनाथ भादुङी की चौथी पीढी सोहम भादुङी और सप्तर्शी भादुङी भी मिल गए।
#Saratchandra #devdas #jagori #satinathbhaduri #bhagalpur #purnea
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..हिन्दी हैं हम ..वतन हैं।
आज हिन्दी दिवस पे लिखते वक्त कुछ अचरज सा हो रहा है.. फिर युं कहूं कि यहाँ तो हर रोज हिन्दी ही हिन्दी है.. ज्ञान में हिन्दी.. प्राण में हिन्दी.. त्राण में हिन्दी.. हिन्दी ही हिन्दी.. दिलो-दिमाग चहुंओर हिन्दी.. जन्म में हिन्दी.. मरण में हिन्दी.. जीवन के आलिंगन में हिन्दी.. विकट-विहंगम में भी हिन्दी.. उत्कट-संगम में भी हिन्दी.. उफ्-आह-आउच में भी हिन्दी.. प्यारी हिन्दी.. न्यारी हिन्दी.. बाल-मनोहर पोथी की हिन्दी.. चंदा मामा.. अमर-चित्र कथा कॉमिक्स वाली हिन्दी.. गीता प्रेस वाली हिन्दी.. सबकी हिंदी.. मेरी हिन्दी.. तुम्हारी हिन्दी.. नेता व अभिनेताओं की हिन्दी.. फिल्मी हिन्दी.. जुमलों की हिन्दी.. बैंको व रशीदों की हिन्दी.. गजलों व लतीफों की हिन्दी.. युपी और बिहार की हिंदी.. चेन्नई व भोपाल की हिन्दी.. मुम्बई और बंगाल की हिन्दी.. देशों और विदेशों की हिन्दी.. जितने गाल उतनी हिन्दी.. जब तक बिन्दी तब तक हिन्दी.. www.vipraprayag.blogspot.in
..मेरी दोस्ती मेरा प्यार !!!
..कोई जब राह न पाए.. मेरे संग आए.. तो पग-पग दीप जलाऐ.. मेरी दोस्ती मेरा प्यार.. मेरी दोस्ती मेरा प्यार..। बचपन में देखे राजश्री प्रोडक्शन की "दोस्ती" फिल्म और इसके गानों ने तो जीने के मायने ही बदल के रख दिए.. दृश्यों में ब्लैक एंड व्हाइट होने के बावजूद भी.. इसके भावपूर्ण रंगों में ही जीना चाहता हूँ। ..आत्म दीपो भव: का तेज मिला तो कितने दीप जले.. सूर सजे.. मित्रगाण हूआ.. राग निकले.. मित्रवत् स्वर क्रमशः क्रमशः स्पर्धा में बदलने लगे। ..मन का नृप गौतम.. थोङा बुद्ध.. थोङा बुद्धू बन मित्र-महल से निकल पङा.. ऐकला चोलो रे.. विह्वल-त्राण लिए..। ..अंगुलिमाल ..मालामाल बन फिर कितने मित्रदोष मिले.. दोस्त बन फिर भी आस्तीनों में सजे रहे.. वे डँसते रहे.. मैं सहता.. रोता हँसता पगलाता .. ज्ञान-मोक्ष-अमृत लिए बस अपना.. मेरी दोस्ती मेरा प्यार.. मेरी दोस्ती मेरा प्यार..। प्रियमित्रों.. आज फिर कहता हूँ इस अद्भुत प्रेम-नीधी में.. मुझे सब कुछ है स्वीकार.. मुझे सब कुछ है स्वीकार.. क्योंकि मित्र ही होते जीवन का ऋंगार..। #happyfriendshipday
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मैं अपने आस-पास की ऐसी दुर्लभ प्रति-मूर्तियों से अब तक अछूता कैसे रह पाया था.. वर्ष २००३ में इंजीनियरिंग के बाद बिहार वापस अपने घर आने के बाद साहित्यिक अभिरुचियों की ऐसी जिज्ञासा रह रह कर मन में कौंधती चली जाती..। अंततः २०१२ मार्च के महिने में दो दिन बङी निश्चिंतता के साथ.. मुझे भारत की सिल्क सिटी या मिनी कलकत्ता कहे जाने वाले मेरे पुर्वजों के शहर भागलपुर में रहने को मिला। धन्यवाद.. दुरदर्शन में प्रसारित उस डॉक्युमेंट्री को जिसमें आज भी भागलपुर यूनिवर्सिटी के हिन्दी व अन्य भाषा विभागों में सैंकड़ों शोध-कार्य "देवदास चरित्र" व "शरतचंद्र कृतियों" पे किए जाने का उल्लेख हुआ था। फिर दिमाग में चल रहे इन्हीं संस्मरणों के साथ मैं सुबह-सुबह होटल के कमरे से बाहर निकल पङा.. फिर एक वृद्ध रिक्सेवाले के साथ भागलपुर के गंगा-घाट वाले इलाको की ओर रुख किया। ..वर्षों बाद खुद को ..शरतचंद्र साहित्य व देवदास चरीत्र के कुछ पुराने अभिलेखों व दस्तावेजों के सम्मुख पाकर रोमांचित हो उठा। शरतचंद्र का बचपन औऱ फिर किशोरावस्था भागलपुर की इन्हीं गलियों में बीता था.. वो यहाँ अपने मामा के घर पे ही रहते थे.. औऱ फिर देवदास चरीत्र उनके जीवन-यात्रा से ही जुङी कहानी तो है। जिसका उल्लेख विष्णु प्रभाकर की "आवारा मसीहा " वृतांत में बङा जीवंत मिलता है। सच में आज वर्षों बीते.. फिर भी भारतीय सिनेमाई बॉक्स अॉफिस देवदास रूपी खास "कल्चरर हेरिटेज" को जीवंत किए रहता है.. कुछ इस तरह की शायद ..."देवदास अपने देवमुख लिए यहीं आस-पास ही तो रहते हैं.. और हमें अनमित सौन्दर्य का दिव्य भान यहीं की गलियों की रसमंजुषाओं से करवाते रहते हैं.."।
#devdas#Saratchandra #bhagalpur
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इधर कुछ दिन हुए.. शाम के वक्त पटना के दरभंगा हाउस वाले गंगा-घाट पे था। १९९५.. जब मैं पहली बार इस घाट पे आया था.. घाट आते वक्त दिखता दरभंगा हाउस का एक पुराना माँ काली का मंदिर..। काफी शूकुन भरी जगह है ये.. शहरी हलचल से दूर। घाटों पे कुछ देर ही सही.. लेकिन इन्हीं कुछ पलों में होता है आत्म-शुद्धिकरण भी..। दुर-दुर तक फैले गंगा के छोर.. मानो आपने संसार से थोङा किनारा ले लिया है..। गोधुली बेला में दिखते अपने घरों को लौटते पक्षियों का विशाल समूह और नावों में बैठकर जाते उस पार से आए ग्रामीण जन भी..। सच में..मोटर लगी इन नावों को देख मैं ठिठक पङा.. मानो इन लहरों पे तैरता सौन्दर्य कुछ बदल सा गया हो। सच में अब नदियों में वो बङी-बङी पतवार लगे नाव कम ही दिखते हैँ.. जिन्हें मैं अक्सर भागलपुर के घाटों में देखा करता था। ..सच में कितना कुछ बदल गया ..इस जल्द पहुँचने की चाह में। ..बढते अॉटो व टैक्सीयों के जंजालों ने तो बैलगाङी.. तांगेवालों को भी नहीं बख्शा.. फिर तो.. कलकत्ता महानगर में चलने वाली ट्राम और हाथ रिक्सागाङी भी याद आने लगे..।
#cityofjoy#Patna #Kolkata www.vipraprayag.blogspot.in
...एक छोटी सी मुलाकात ..एक छोटी कहानी के साथ !!!
सवारी कोच बस लगभग मोकामा ब्रीज के पास पहुंचने को थी.. रात के करीब १२ बजने को होंगे.. दिसंबर के उस कपकपाते ठंडे महिने में भी जैसे बंद शीशे के अंदर दम घुटा जा रहा था। थोङी राहत के लिए.. मैंने खिङकी के शीशे को जरा सा सरका दिया। तभी मेरे बाजु वाले सीट पे बैठे बुजुर्ग ने मुझसे पुछा "आप भी पूर्णियाँ ही जा रहे हैं ना.." मैने कहा "जी.. हाँ.."। वो पूर्णियाँ के ही एक बङे बैंक के अधिकारी थे। बात-चित का सिलसिला कुछ आगे बढा.. उनके कुछ परिजन वर्षों पहले हमारे मोहल्ले ही रहते थे..। फिर जैसे मुझे नींद आने लगी.. उन्होने पुछा.." वर्ल्ड की सबसे छोटी कहानी जानते हो.." "जी नहीं.. जरा बताऐ.." "अंधेरी रात के सफर में खाली पङे ट्रेन के एक बॉगी में.. एक अंजान आदमी ने दुसरे से पूछा "क्या तुमने कभी भूत-प्रेतों को देखा है .." इतना कह वो अगले स्टेशन उतर गया..।" फिर पूर्णियाँ पहुंचने के दो दिन बाद उस शख्स के दिऐ फोन नंबर से भी कोई रेस्पोंस नहीं मिला..। www.vipraprayag.blogspot.in
....कैसे हैं आप लोग !!! हिन्दी पढ ठहर गए ना..। ऐसे भी दिनभर के न्यूज अपडेट.. और शेयरींग्स के बीच हिन्दी से लिखे शब्दों को देख लेना.. ठंडी फुहार से कुछ कम तो नहीं..। हाँ.. वर्षो बाद एन्ड्रोएड मोबाईल में हिन्दी एडिटर का साथ जो मिला.. जैसे कब की खोयी साँस मिल सी गयी। वैसे भी अब.. लिखता कौन है.. सारी बातें और खबरें तो मोबाईल के जरीए ही हो जाया करतें हैं..। लिखने के भावों की आंतरिकता ही मृतप्राय सी हो गयी है.. मानो हम खुद को ही समय देने को तैयार नहीं..। हाल के दिनों में अपने घर के आलमारी में रखे.. कुछ ऐसे भावों के दस्तावेज मिले..। हिन्दी में लिखे कुछ ऐसे पत्र जिसे मेरे दादाजी ने बङे जतन से संभाले रखा था..। इन्हें पढते ही आप बीते दिनों के.. उन भावों में दुबारा जी उठते हैं.. जिन्हें हमारे परिजनों ने बङी ही तल्लीनता के साथ सींचा.. और आज हम उन्हीं उन्मुक्त भावों की वृष्टि-छाया में खुद को सहेजे व भिंगो रहे हैँ..। मन में बस एक ही इच्छा जगी कि ये कलम फिर से चलने चाहिए.. हिंदी के शब्द फिर से दिखने चाहिए..।www.vipraprayag.blogspot.in